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Mission 2027 के लिए सज गया सियासी रण, राम मंदिर से वंदे मातरम तक; कौन मारेगा चुनावी मैदान में बाजी?

Updated: Mon, 17 Aug 2026 09:00 PM (IST)

संसद का मानसून सत्र भले ही धुल गया हो, लेकिन राजनीतिक दल आगामी चुनावों के लिए मुद्दों को भुनाने में लगे हैं।

(यह तस्वीर AI से बनाई गई है)

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। जनहित के दृष्टिकोण से इस बार संसद का मानसून सत्र भले ही धुला-धुला नजर आ रहा हो, लेकिन राजनीतिक दल यहां से बैरंग नहीं लौटे हैं। कुछ माह बाद ही कई राज्यों में होने जा रहे चुनावों पर निगाह जमाए विपक्ष उत्साहित है कि जिन मुद्दों पर उसने संसद में सरकार को ललकारा, उन्हीं के सहारे अब चुनावी मैदान में भी पटखनी दी जा सकती है।

वहीं, इस सियासी कुश्ती में कई दिन तक रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दिया सत्ता पक्ष फिर ताल ठोंक कर खड़ा है। नेताओं की भाव-भंगिमाएं और इंटरनेट मीडिया पर अचानक बढ़ी आक्रामक सक्रियता संदेश दे रही है कि अब बैकफुट पर जाने की बारी विपक्ष की है।

नैरेटिव की लड़ाई में सत्ता पक्ष और विपक्ष

बेशक, राज्य वार चुनावी मुद्दे बदल जाएंगे, लेकिन फिर मनोबल बढ़ाने-तोड़ने के लिए नैरेटिव की लड़ाई में यह मुद्दे माहौल बनाने के लिए फिलहाल काफी हैं। जंतर मंतर के जवाब में रांची, देश के सम्मान के नाम पर अब वंदे मातरम और सुरक्षा के मोर्चे पर दिमागी नक्सली जैसे नैरेटिव तेज हैं।

संसद के मानसून सत्र में विपक्ष इस बार बांहें चढ़ाकर आया था। उसका तेवर चढ़ा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि सरकार के सामने मुद्दों की चुनौती थी भी। कांग्रेस ने छात्र आंदोलन को प्रमुखता से पकड़ लिया तो समाजवादी पार्टी ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले को तूल देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

भाजपा को कैसे मिला बाजी पलटने का मौका?

आम आदमी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दलों ने भी सुविधा अनुसार इनके सुर में सुर मिलाए। सदन नहीं चला और विपक्ष गृह मंत्री से छात्रों पर कार्रवाई को लेकर जवाब मांगकर जनता को यह संदेश देने के प्रयास में था कि सरकार घिर गई है और चर्चा से बच रही है। हालांकि, मानसून सत्र का समापन करीब आते-आते सियासी मौसम अचानक बदल गया।

जैसे ही गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं सामने आकर छात्रों पर कार्रवाई से संबंधित सभी बिंदुओं पर जवाब देने का प्रस्ताव रखा और विपक्ष चर्चा के लिए सहमत नहीं हुआ तो भाजपा को बाजी पलटने का मौका मिल गया।

सरकार ने फिर यही संदेश दिया कि विपक्ष खुद चर्चा से भाग गया। इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष की सभा के बाद मंच के शुद्धिकरण के मुद्दे ने सरकार को असहज किया। मामला सड़क तक पहुंचते-पहुंचते और घटनाक्रम इस सूची में जुड़ गए।

राहुल सीधे सरकार के निशाने पर कैसे आए? 

रचनात्मक कांग्रेस के मंच से जिस तरह से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और भारत की विदेश नीति के लिए टिप्पणियां कीं और कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने इटली की प्रधानमंत्री के लिए टिप्पणी कर सरकार के साथ में अपने ही विरुद्ध अस्त्र थमा दिया। इसके सहारे राहुल सीधे सरकार के निशाने पर आ गए।

फिर स्वतंत्रता दिवस पर जिस तरह से सोनिया गांधी द्वारा कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम का गान बीच में रुकवाने के प्रयास का वीडियो सामने आया, वैसे ही भाजपा राष्ट्रवाद की पिच पर अपने मुद्दे के सहारे सीना तानकर खड़ी हो गई। अब फिलहाल कांग्रेस सहित विपक्ष रक्षात्मक मुद्रा में है।

दिमागी नक्सली का बयान भी इसी कड़ी में शामिल है विपक्ष के कई नेता खुद भी दिमागी नक्सली बताकर इसकी काट ढूंढ रहे हैं।

परिस्थितियां इशारा कर रही हैं कि यह मुद्दे फिलहाल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे चुनावी राज्यों में पकाने की पूरी कोशिश होगी। दलों का रणनीतिक अौर संगठनात्मक कौशल तय करेगा कि नैरेटिव की लड़ाई में कौन आगे खड़ा दिखाई देता है।

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