मुस्लिमों ने थामा कांग्रेस का हाथ, पांच राज्यों में जीते 29 उम्मीदवार; क्या है आगे का प्लान?
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और उसके सहयोगियों के मुस्लिम उम्मीदवारों ने अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में उल्लेखनीय जीत दर्ज की, जिससे मुस्लिम मतदाताओं का मजबूत समर्थन दिखा।

राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में ध्रुवीकरण की राजनीति का असर साफ दिखाई दिया, जहां कांग्रेस और उसके सहयोगियों के मुस्लिम उम्मीदवारों ने अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में उल्लेखनीय जीत दर्ज की।
खासकर असम, केरल और बंगाल में पार्टी को मुस्लिम मतदाताओं का मजबूत समर्थन मिला है, लेकिन अन्य वर्गों में उसका आधार सिमटता नजर आ रहा है।
यही कारण है कि इन नतीजों को कांग्रेस के लिए 'धूप-छांव' जैसी स्थिति के रूप में देखा जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, इन राज्यों में जीतने वाले मुस्लिम प्रत्याशियों में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट करीब 80 प्रतिशत रहा।
असम में कांग्रेस ने 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से 18 जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके उलट, पार्टी के 79 गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में से सिर्फ एक ही जीत सका, जो पार्टी में सामाजिक आधार के असंतुलन की ओर इशारा करता है।
केरलम में 35 मुस्लिम प्रत्याशी विजयी
केरल में कुल 140 सीटों में से 35 मुस्लिम प्रत्याशी विजयी हुए, जिनमें 30 कांग्रेस नीत यूडीएफ गठबंधन के हैं। इनमें आठ कांग्रेस के और 22 सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के टिकट पर जीते।
यह परिणाम मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस गठबंधन की मजबूत पकड़ को दर्शाता है। तमिलनाडु में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए, जिसमें एक ने जीत दर्ज की।
बंगाल में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के 47 के मुकाबले 63 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसे केवल दो मुस्लिम बहुल सीटों पर ही सफलता मिली। दोनों सीटों पर विजयी उम्मीदवार इसी वर्ग से रहे। यह संकेत देता है कि मुस्लिम मतों में समर्थन के बावजूद व्यापक सामाजिक आधार बनाने में पार्टी को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम मतदाताओं का यह झुकाव कांग्रेस के लिए अवसर के साथ-साथ चुनौती भी है। हिंदी पट्टी के राज्यों में यदि ध्रुवीकरण की राजनीति तेज होती है, तो यह समीकरण पार्टी के लिए उल्टा भी पड़ सकता है।
यूपी चुनाव के लिए क्या होगी रणनीति
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर यह मुद्दा अहम बन सकता है। वैसे भी सपा नहीं चाहती कि उसने वर्षों तक 'एमवाई' यानी मुस्लिम-यादव की रणनीति के साथ जो वोटबैंक तैयार किया है, उसका और कोई हिस्सेदार प्रदेश की राजनीति में खड़ा हो।
यही कारण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल सीटों पर दावेदारी को लेकर दोनों गठबंधन सहयोगियों के बीच खींचतान की खबरें सामने आई थीं।
इसके साथ ही यह रुझान राष्ट्रीय जनता दल और झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए भी संकेत है, जिनका पारंपरिक आधार मुस्लिम मतदाता रहे हैं।
राजनीतिक तौर पर कांग्रेस इस परिणाम से उत्साहित होकर अपने पुराने वोटबैंक की वापसी की उम्मीद कर सकती है, लेकिन उसे व्यापक सामाजिक संतुलन साधने की चुनौती से भी जूझना होगा।
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