विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

कांग्रेस में दिखी मुस्लिमों की रुचि, धूप छांव जैसी स्थिति

Published: Tue, 05 May 2026 11:58 PM (IST)

हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मुस्लिम उम्मीदवारों के साथ अच्छी सफलता मिली, खासकर असम, केरल और पश्चिम बंगाल में, जहां उसका स्ट्राइक रेट लगभग 80% रहा।

कांग्रेस में दिखी मुस्लिमों की रुचि। (फाइल)

कांग्रेस में दिखी मुस्लिमों की रुचि। (फाइल)

HighLights

  1. कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत दर लगभग 80% रही।

  2. असम, केरल, पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतों का मजबूत साथ मिला।

  3. अन्य वर्गों में कांग्रेस का जनाधार कम होता दिखा।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में विशेष रूप से असम, केरल और पश्चिम बंगाल ने कांग्रेस के लिए धूप और छांव की दो तस्वीरें सामने रख दी हैं। अब कांग्रेस चाहे तो इसे सुकून भरी छांव मानकर आंखें मूंद सकती है कि इन राज्यों में जीते मुस्लिम उम्मीदवारों में उसका स्ट्राइक रेट लगभग 80 प्रतिशत है और असम में जीते 19 में 18 मुस्लिम विधायक हैं।

वहीं, आंख खोलकर आत्मचिंतन करे तो कांग्रेस समझ सकती है कि अन्य वर्गों में उसका जनाधार लगभग सिमटा दिख रहा है। मुस्लिम मतों पर पकड़ की यह उपलब्धि हिंदी पट्टी के राज्यों में ध्रुवीकरण की परिस्थिति बनने पर उसके लिए चुनौती खड़ी कर सकती है।

एक दूसरा पहलू यह है कि मुस्लिम मतों का लौटना उन क्षेत्रीय दलों के लिए भी अलार्म बजाने जैसा है, जिन्होंने मुस्लिम मतों का मजबूत वोटबैंक इतने वर्षों में बनाया है। इन हालात में सपा-कांग्रेस के बीच समन्वय और संतुलन की पहली परीक्षा तो अगले वर्ष उत्तर प्रदेश के चुनाव में ही संभावित है।

दरअसल, असम, पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में कांग्रेस ने दिल खोलकर मुस्लिम कार्ड चला। चुनाव परिणाम बताते हैं कि अन्य वर्गों पर उसका कोई दांव भले ही न चला हो, लेकिन यह कार्ड जरूर चला है। जैसे कि 126 विधानसभा सीटों वाले असम में कांग्रेस ने कुल 20 मुस्लिमों को टिकट दिए थे, जिसमें से 18 जीते हैं। वहीं, गैर मुस्लिम 79 उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें से सिर्फ एक को जीत मिली।

इसी तरह 140 सीटों वाले केरलम में सभी दलों के मिलाकर कुल 35 मुस्लिम प्रत्याशी विजयी हुए हैं। इनमें से 30 कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन के हैं। आठ कांग्रेस के, जबकि 22 उसके सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के टिकट पर लड़े थे।

वहीं, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के 47 के मुकाबले कहीं अधिक 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा। कांग्रेस को सिर्फ दो मुस्लिम बहुल सीटों पर सफलता मिली और दोनों विजेता इसी वर्ग से हैं। यह आंकड़े समझाते हैं कि जहां अन्य वर्गों का भरोसा कांग्रेस से टूट-बिखर चुका है, वहीं मुस्लिमों ने मजबूती से उसका हाथ किस तरह थामा है।

राहुल गांधी की पार्टी यहां से उत्साहित होकर पुराने वोटबैंक की वापसी की आस के साथ अन्य राज्यों के चुनाव अभियान में आगे बढ़ेगी। वर्ष 2027 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन सबसे प्रमुख है उत्तर प्रदेश।

अभी तक तो औपचारिक ऐलान है कि सपा और कांग्रेस यह चुनाव भी गठबंधन में रहकर ही लड़ेंगे। संभव है कि टिकट बंटवारे के दौरान सपा की निगाह इन चुनाव परिणामों पर रहे कि मुस्लिमों में भरोसे के विकल्प कांग्रेस भी मजबूती के साथ बन सकती है।

वैसे भी सपा नहीं चाहती कि उसने वर्षों तक ''एमवाई'' यानी मुस्लिम-यादव की रणनीति के साथ जो वोटबैंक तैयार किया है, उसका और कोई हिस्सेदार प्रदेश की राजनीति में खड़ा हो।

यही कारण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल सीटों पर दावेदारी को लेकर दोनों गठबंधन सहयोगियों के बीच खींचतान की खबरें सामने आई थीं। ऐसी ही असहज स्थिति झारखंड में झामुमो, बिहार में राजद जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ भविष्य में बन सकती है।

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।