'सीएपीएफ में आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति जरूरी', केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दायर किया हलफनामा
केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 शीर्ष अदालत के 2025 के ...और पढ़ें

'सीएपीएफ में आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति जरूरी', केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा (सांकेतिक तस्वीर)
HighLights
गृह मंत्रालय, डीओपीटी और सीआरपीएफ ने दायर किया संयुक्त हलफनामा
कहा- सीएपीएफ एक्ट, 2026 कोर्ट के 2025 के फैसले को निष्प्रभावी नहीं करता
पीटीआई, नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 शीर्ष अदालत के 2025 के फैसले को निष्प्रभावी नहीं करता, बल्कि यह एक मुनासिब कदम है।
यह उस आधार को बदलता है जिस पर फैसले में दिए गए निर्देश आधारित थे। साथ ही केंद्र ने सीएपीएफ में आइपीएस अधिकारियों की नियुक्ति को आवश्यक बताया है।
गृह मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग और सीआरपीएफ ने एक संयुक्त हलफनामे में यह बात कही। उन्होंने सीएपीएफ संवर्ग के अधिकारियों की ओर से दायर रिट याचिका खारिज करने का अनुरोध किया।
केंद्र की दलील है कि आइपीएस अधिकारी सीएपीएफ के नेतृत्व में संबंधित राज्यों के प्रशासन, पुलिस बलों और प्रत्येक क्षेत्र की आंतरिक सुरक्षा स्थिति की जानकारी लेकर आते हैं, जो अलग-अलग और विशिष्ट कार्य करने वाले सीएपीएफ के लिए मददगार होती है।
सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट और शौर्य चक्र से सम्मानित बिभोर कुमार सिंह के नेतृत्व में सीएपीएफ अधिकारियों के एक समूह ने यह रिट याचिका दायर की है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2026 का कानून सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया।
यह मनमाना व भेदभावपूर्ण है, क्योंकि यह इन बलों में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले आइपीएस अधिकारियों के कारण संवर्ग अधिकारियों की पदोन्नति में आ रही ठहराव की समस्या का समाधान नहीं करता।
अधिनियम के तहत आइजी रैंक के 50 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति के जरिये आइपीएस से भरे जाएंगे, जबकि अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के कम से कम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने हैं। विशेष महानिदेशक और महानिदेशक के पद केवल प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे।
शीर्ष अदालत ने 2025 के अपने आदेश में केंद्र को पांच सीएपीएफ (सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआइएसएफ, आइटीबीपी और एसएसबी) में आइजी रैंक तक आइपीएस के अधिकारियों की तैनाती धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया था।
संसद ने सीएपीएफ अधिनियम अप्रैल में पारित किया था और केंद्र सरकार ने इसे आठ अक्तूबर से लागू कर दिया है।
मनी लांड्रिंग मामले में उद्योगपति संजय सुरेका को सुप्रीम कोर्ट से जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कानकास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड के मालिक उद्योगपति संजय सुरेका को मनी लांड्रिंग मामले में जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में काफी समय लग सकता है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को हजारों पन्नों के दस्तावेजों की जांच करनी होगी और करीब 98 गवाहों के बयान दर्ज करने होंगे। ऐसे में मुकदमे के लंबित रहने तक सुरेका को हिरासत में रखना उचित नहीं है।
शीर्ष न्यायालय ने निर्देश दिया कि सुरेका अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करेंगे और उसकी पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे। उन्हें गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने से भी रोक दिया गया है। जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर ट्रायल कोर्ट जमानत रद कर सकता है।
शिकायत के अनुसार, सुरेका पर कंपनी का कारोबार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर बैंकों से बड़े ऋण हासिल करने और मुखौटा कंपनियों के जरिए धन दूसरी जगह भेजने का आरोप है। मामले में कथित अपराध से प्राप्त रकम 6,210.72 करोड़ रुपये है, जिसमें से अब तक मनी लांड्रिंग निवारण अधिनियम के तहत 777.10 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की गई है।
