'उन्हें हजार बार सोचना चाहिए था...', जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर पूर्व CJI गवई और रिटायर्ड जजों ने की आलोचना
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और अन्य रिटायर्ड जजों ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की चुनाव आयोग पर की गई टिप्पणियों की आलोचना की है।

पूर्व CJI गवई ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी को न्यायिक मर्यादा के खिलाफ बताया

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और अन्य रिटायर्ड जजों ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की चुनाव आयोग पर की गई टिप्पणियों की आलोचना की।
गवई ने कहा कि एक मौजूदा जज को वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) पर चल रहे विवाद पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर नाराज हुए पूर्व CJI
गवई ने समाचार एजेंसी PTI से कहा, 'न्यायिक मर्यादा उन्हें ऐसे मामले पर कोई टिप्पणी करने की इजाजत नहीं देती जो कोर्ट में विचाराधीन है।'
दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस.एन. ढींगरा और आर.एस. सोढ़ी ने भी भुइयां की टिप्पणियों पर सवाल उठाए। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि भुइयां का बयान सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज की सीमाओं से कहीं आगे था और ऐसे कमेंट्स किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं किए जाने चाहिए, जब वही मुद्दा उसी कोर्ट में लंबित हो।
ढींगरा ने कहा, 'उन्हें ऐसा बयान देने से पहले हजार बार सोचना चाहिए था और साथ ही कहा कि जस्टिस भुइयां को इस मुद्दे की पूरी जानकारी नहीं थी।
SC के पूर्व जजों ने भी की आलोचना
जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने भी SIR प्रक्रिया को 'वोट के अधिकार से वंचित करना' कहने के लिए जस्टिस भुइयां की आलोचना की और कहा कि वोट का अधिकार कानूनी ढांचे से तय होता है। आपके पास वोट है या नहीं, यह कानून पर निर्भर करता है। अगर आप कानून के दायरे में आते हैं, तो आपके पास वोट है।
जस्टिस सोढ़ी ने कहा, 'अगर आप कानून के दायरे में नहीं आते हैं, तो आपको वोट देने का अधिकार नहीं है।' उन्होंने कहा, 'मेरा मतलब है कि ऐसी कट्टर सोच और ऐसे कट्टर बयान, मेरे हिसाब से किसी चीज को देखने का बहुत समझदारी भरा तरीका नहीं है, खासकर तब जब आप ऐसे क्षेत्र में हों जहां तर्कसंगत सोच की उम्मीद की जाती है।'
जस्टिस भुइयां ने क्या कहा था?
यह बात जस्टिस भुइयां के उस बयान के एक दिन बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को 'वोट देने के अधिकार से वंचित' करती है, वह मूल रूप से मनमानी है और संवैधानिक व्यवस्था को 'नकारने' जैसा है।
रविवार को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता है एक जिन्हें वोट देने का अधिकार है और दूसरा जिन्हें नहीं और किसी भी तरह की "क्या-क्या-बारे-में" वाली दलीलें ऐसी प्रक्रिया को सही नहीं ठहरा सकतीं।
