दुनिया में खुली रोजगार की राह : भारत में कुशल प्रवासियों के लिए नए विकल्प, नीति आयोग की रिपोर्ट में दावा
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2024 में 137.67 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला, जो 2029 तक 160 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। ...और पढ़ें

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जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। दुनिया सहित भारत में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर चिंता है। तमाम युवाओं को नौकरी का संकट नजर आता है। इस बीच नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट संभावना की वह राह दिखाती है, जहां विदेश में भारत के कुशल युवाआें के लिए रोजगार के अवसर लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
संभावनाओं को इन आंकड़ों से बल मिलता है कि वर्ष 2020-11 के मुकाबले वर्ष 2023-24 में रेमिटेंस (प्रवासी कामगारों द्वारा अपने देश को भेजी जाने वाली रकम) में दोगुणी से अधिक वृद्धि हुई है। वैश्विक रेमिटेंस में भारत की हिस्सेदारी 2001 में 11 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में लगभग 14 प्रतिशत हो गई।
यूनाइटेड नेशन्स डिपार्टमेंट आफ इकोनामिक एंड सोशल अफेयर्स की 'इंटरनेशनल माइग्रेंट स्टाक 2024' रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत को 137.67 अरब डालर का रेमिटेंस मिला, जो कि 2029 तक 160 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान है।
तमाम अध्ययनों के आधार पर नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की संख्या 1.85 करोड़ है, जो दुनिया में प्रवासियों की सबसे बड़ी आबादी है। इसके माध्यम से भारत को 2024 में जो रेमिटेंस मिली, वह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.5 प्रतिशत है।
2024 में भारत को 137.67 अरब डॉलर रेमिटेंस मिला
आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि रेमिटेंस भारत की आर्थिक स्थिति का एक अहम हिस्सा बन गया है, जो सीमाओं के पार अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक स्थिरता और मजबूती में बड़ा योगदान देता है। यह देश के व्यापार घाटे की भी भरपाई करता है। यदि भारतीय युवाआें के लिए विदेश में रोजगार के अवसरों की बात करें तो इसमें भी बदलाव देखा जा रहा है।
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भारतीय रेमिटेंस कारिडोर में अब तक सबसे बड़ी भूमिका खाड़ी देशों की रही है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ओमान और बहरीन भारत में आने वाले रेमिटेंस का मुख्य स्रोत रहा है। 2016–17 में कुल रेमिटेंस में इसकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक थी, जो मुख्य रूप से कंस्ट्रक्शन, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर में काम करने वाले कम हुनरमंद और बिना हुनर वाले मजदूरों की वजह से थी।
वहीं, 2016 के बाद से गल्फ देशों में जाने वालों की संख्या में कमी आई है। 2020-21 में खाड़ी क्षेत्र से आने वाले रेमिटेंस की हिस्सेदारी घटकर 30 प्रतिशत रह गई थी। हालांकि 2023–24 में इसमें कुछ सुधार हुआ। इसके विपरीत अमेरिका, यूके, कनाडा, सिंगापुर और आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में कुशल कामगारों के जाने की संख्या बढ़ रही है।
बूढ़ी होती आबादी के बोझ ने खोले भारत के लिए द्वार
आबादी का बूढ़ा होना प्रवासी कामगारों की मांग बढ़ने का प्रमुख कारक है। जैसे कि यूरोपीय संघ में काम करने की उम्र वाली आबादी 2012 में 26 करोड़ 90 लाख से घटकर 2021 में 26 करोड़ 40 लाख हो गई और अनुमान है कि 2050 तक इसमें और तीन करोड़ 50 लाख की कमी आएगी। वहीं, 2030 तक देखभाल की जरूरत वाले लोगों की संख्या 2.3 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसकी वजह बुजुर्गों और 6-14 साल के बच्चों की बढ़ती संख्या है।
इसके कारण 2030 तक 28 करोड़ नौकरियां पैदा हो सकती हैं और 2035 तक यह संख्या 29.9 करोड़ हो सकती है। दुनिया भर में सात करोड़ से ज्यादा स्वास्थ्य कर्मचारी होने के बावजूद नए अनुमान बताते हैं कि 2030 तक 1.11 करोड़ स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी हो सकती है।
कई देशों को स्वास्थ्य सेवाएं जारी रखने और बढ़ती उम्र वाली आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त 84 लाख स्वास्थ्य कर्मचारियों की जरूरत पड़ने की उम्मीद है। वर्तमान में भी कई देश कामगारों की कमी से जूझ रहे हैं। यूरोप में सबसे ज्यादा लगभग 105 लाख रिक्तियां हैं।
इसके बाद अमेरिका में लगभग 72 लाख और खाड़ी देशों में लगभग 27 लाख जगह खाली हैं। जापान में नौ लाख से अधिक और यूके में लगभग आठ लाख कामगारों की कमी है। इसी तरह कनाडा और आस्ट्रेलिया में क्रमशः लगभग पांच लाख और दो लाख खाली पद हैं। इन देशाें में ज्यादातर रिक्तियां हेल्थ और केयर सर्विस, इंजीनियरिंग, डिजिटल, टेक्नोलाजी-आधारित कार्य, कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कामों में हैं।