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भारत में बदल रहा क्लाइमेट पैटर्न... अधिक उग्र होगा मानसून, बारिश बहुत कम बार लेकिन होगी बहुत जोरदार

Updated: Wed, 26 Aug 2026 07:58 AM (GMT+05:30)

आईआईटी रुड़की के शोध के अनुसार, भारत में मानसून का पैटर्न बदल रहा है, जिससे बारिश कम बार लेकिन बहुत जोरदार होगी। इससे चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ेगा।

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HighLights

  1. आईआईटी रुड़की: मानसून कम बार, पर बहुत जोरदार बारिश।

  2. चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ेगा, बाढ़ की आशंका अधिक।

  3. मौजूदा जल निकासी प्रणालियों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आने वाले समय में भारत में मानसून का रौद्र रूप देखने को मिल सकता है। अनुमान है कि ज्यादा बारिश के साथ-साथ मौसम की चरम स्थितियों का खतरा भी बढ़ सकता है। आईआईटी रुड़की के रिसर्चर्स की एक स्टडी के मुताबिक, उम्मीद है कि मानसून की बारिश बहुत कम होगी लेकिन जब भी होगी बहुत जोरदार होगी।

स्टडी में कहा गया कि असल में इसका मतलब यह नहीं है कि कुल मिलाकर बारिश वाले दिन बढ़ेंगे बल्कि इसका मतलब है कि बारिश जोरदार दौर में होगी। इससे शहर के नाले भर सकते हैं, नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और किसानों व आपदा प्रबंधन करने वालों के पास तैयारी के लिए कम समय बचेगा।

एडवांस्ड स्टैटिस्टिकल तकनीक का किया गया इस्तेमाल

रिसर्चर्स ने 13 ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल और एक एडवांस्ड स्टैटिस्टिकल तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तकनीक को बारिश और तापमान के अनुमानों के बीच के संबंध को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया था, न कि दोनों वेरिएबल्स को अलग-अलग ठीक करने के लिए।

इस डेटासेट का इस्तेमाल करके रिसर्चर्स ने एक मेट्रिक को ट्रैक किया। असल में यह मानसून सीजन की कुल बारिश का वह हिस्सा है जो सबसे ज्यादा बारिश वाले दिनों में होती है।

नतीजा क्या निकला?

नतीजों से पता चला कि पूरे भारत में इस सदी के दौरान यह हिस्सा लगातार बढ़ने का अनुमान है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ने के साथ यह बढ़ोतरी और तेज होती जाएगी। सबसे ज्यादा उत्सर्जन वाले सिनेरियो में पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों में हाल के समय (1985-2014) की तुलना में 2100 तक कुल मानसून बारिश में बहुत ज्यादा बारिश वाले दिनों का योगदान 25% से 40% से ज्यादा बढ़ सकता है।

यह ट्रेंड 2021-2050 के लिए हाल के अनुमानों में पहले से ही दिख रहा है लेकिन स्टडी में पाया गया कि सदी के दूसरे हिस्से में यह काफी बढ़ जाता है। यानी समय के साथ जोखिम कम होने के बजाय और बढ़ता जाता है। रिसर्चर के अनुसार, इस डेटासेट को जो चीज खास बनाती है वह सिर्फ अनुमान ही नहीं बल्कि उनके पीछे का तरीका भी है।

क्लाइमेट मॉडल में इस्तेमाल होने वाले पुराने बायस-करेक्शन (पूर्वाग्रह-सुधार) तरीकों में अक्सर बारिश और तापमान के डेटा को अलग-अलग एडजस्ट किया जाता था, जिससे इन दोनों के बीच का असल संबंध टूट सकता है। जैसे कि मानसून के दौरान बहुत ज्यादा बारिश और बढ़ता तापमान अक्सर एक साथ होते हैं।

आईआईटी रुड़की की टीम का तरीका इस संबंध को बनाए रखता है। उनका कहना है कि इससे डेटासेट भौतिक रूप से ज्यादा वास्तविक और व्यावहारिक कामों, जैसे बाढ़ की भविष्यवाणी, सूखे की निगरानी, खेती की योजना और इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन के लिए ज्यादा उपयुक्त बन जाता है।

स्टडी में क्या पाया गया?

स्टडी में यह भी पाया गया कि तापमान का बढ़ना हर जगह एक जैसा नहीं है। कई इलाकों में खासकर उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में दिन के अधिकतम तापमान की तुलना में रात का न्यूनतम तापमान तेजी से बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं ने इस पैटर्न को पहले हुए वैज्ञानिक शोध से जोड़ा है, जिसमें बताया गया था कि लंबे समय तक रहने वाली धुंध और एरोसोल प्रदूषण सूरज डूबने के बाद गर्मी को रोककर रखते हैं।

भारत की जलवायु एक समान रूप से गर्म होने के बजाय ज्यादा चरम और कम अनुमान लगाने योग्य स्थितियों की ओर बढ़ रही है। इस स्टडी में यह नतीजा निकला कि मानसून के औसत व्यवहार को ध्यान में रखकर बनाए गए ड्रेनेज सिस्टम, जलाशय प्रबंधन और शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम का दोबारा मूल्यांकन करना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भविष्य में उतनी ही सालाना बारिश कम समय में लेकिन कहीं ज्यादा जोरदार बारिश के रूप में हो सकती है।

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