लाल आतंक पर अंतिम प्रहार: 31 मार्च तक माओवाद की विदाई का 'काउंटडाउन' शुरू
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित 31 मार्च की समयसीमा के करीब आने के साथ, भारत में माओवाद अपने अंत की ओर है। सुरक्षा बल 'ऑपरेशन क्लीन स्वी ...और पढ़ें

31 मार्च तक माओवाद की विदाई का 'काउंटडाउन' शुरू। (फाइल)
HighLights
गृह मंत्री अमित शाह की 31 मार्च तक माओवाद समाप्ति की समयसीमा।
'ऑपरेशन क्लीन स्वीप' के तहत बचे माओवादी कैडरों पर अंतिम प्रहार।
बस्तर का 96% क्षेत्र अब नक्सल मुक्त, विकास पर जोर।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के माथे पर लगा माओवाद का कलंक अब मिटने की कगार पर है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित 31 मार्च की समयसीमा जैसे-जैसे करीब आ रही है, सुरक्षा बलों ने 'लाल आतंक' के अंतिम किलों को ढहाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। यह केवल एक सैन्य अभियान नहीं है, बल्कि दशकों के संघर्ष, बलिदान और आंसुओं के बाद शांति की ओर बढ़ता एक निर्णायक कदम है।
सरंडा से बस्तर तक 'ऑपरेशन क्लीन स्वीप' सुरक्षा बलों ने बचे हुए सशस्त्र माओवादी कैडरों को बेअसर करने के लिए एक विशाल घेराबंदी शुरू की है। छत्तीसगढ़ से 'कोबरा' की विशेष इकाइयों को झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के सरंडा जंगलों में भेजा गया है। वहीं, बस्तर के बीहड़ों में सीआरपीएफ, बीएसएफ और आइटीबीपी की टीमें माओवादियों को या तो आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर रही हैं या फिर मुठभेड़ में उनका खात्मा सुनिश्चित कर रही हैं।
130-150 सशस्त्र कैडर सुरक्षा बलों के निशाने पर
150 सशस्त्र कैडर सुरक्षा बलों के निशाने पर अधिकारियों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 130-150 सशस्त्र कैडर सुरक्षा बलों के निशाने पर हैं। इसमें माओवादी नेता मिसिर बेसरा की तलाश तेज है, जबकि 'रमन्ना' जैसे बड़े नेताओं के आत्मसमर्पण की सुगबुगाहट है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा की सीमा पर एक साझा 'क्रॉस-बार्डर' ऑपरेशन भी चलाया जा रहा है ताकि माओवादी कहीं भी छिप न सकें।
बंदूक की जगह अब विकास का ब्लूप्रिंट केंद्र सरकार केवल सैन्य जीत ही नहीं, बल्कि दिलों को जीतने की योजना पर भी काम कर रही है। 31 मार्च के बाद एक 'ऑपरेशन्स एंड डेवलपमेंट' ब्लूप्रिंट पेश किया जाएगा। इसके तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से अर्धसैनिकबलों की करीब पांच बटालियनों की वापसी की संभावना है, क्योंकि छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा के अनुसार, बस्तर का 96 प्रतिशत हिस्सा अब नक्सल मुक्त हो चुका है।
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जंगलों में बिछाए गए बारूद के जाल को साफ करने की मुहिम
अब इन क्षेत्रों की कमान स्थानीय पुलिस और डीआरजी संभालेंगे, जबकि बलों को सीमा सुरक्षा या मणिपुर जैसे क्षेत्रों में तैनात किया जा सकता है। सिर्फ सात जिलों तक सिमटा यह नासूर अगले महीने से 'ब्लैक कैट्स' (एनएसजी) और सीआरपीएफ की बम निरोधक टीमें एक बड़ा 'डी-माइनिंग' अभियान शुरू करेंगी, ताकि जंगलों में बिछाए गए बारूद के जाल को साफ किया जा सके और ग्रामीण बेखौफ होकर अपनी जमीन पर चल सकें।
कभी 2005-06 में देश के 76 जिलों में फैला यह नासूर अब सिमटकर केवल सात जिलों (बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर, दंतेवाड़ा, पश्चिम सिंहभूम और कंधमाल) तक रह गया है। 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह खूनी सफर, जिसमें 17,000 निर्दोषों की जान गई, अब अपने अंत की ओर है। यह जीत उन बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने तिरंगे की आन के लिए अपना बलिदान दिया।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)