EOS-05 की 'नॉटी बॉय' से लॉन्चिंग: अब चीन-पाकिस्तान सीमाओं पर होगी पैनी नजर, सुरक्षा मायनों से क्यों है खास?-10 Points
इसरो एक बार फिर अंतरिक्ष में उड़ान भरने को तैयार है। शुक्रवार तड़के GSLV-F17 रॉकेट से EOS-5 उपग्रह लॉन्च होगा, ...और पढ़ें
HighLights
EOS-5 भारत की 'तीसरी आंख' के रूप में काम करेगा।
GSLV F17 रॉकेट से श्रीहरिकोटा से होगा लॉन्च।
सीमा सुरक्षा, मौसम, आपदा प्रबंधन में सहायक होगा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) एक बार फिर अंतरिक्ष में अपनी ताकत दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है। अपने पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) रॉकेट की लगातार दो असफलताओं के बाद, इसरो लगभग आठ महीने के लंबे अंतराल के बाद एक बेहद अहम और धमाकेदार वापसी करने जा रहा है।
इसी क्रम में इसरो 4 सितंबर को तड़के 2:55 बजे अपने सबसे दूरदर्शी अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट EOS-5 को अंतरिक्ष में भेजने जा रहा है। इस मिशन को भारत के सबसे भरोसेमंद भारी रॉकेट GSLV F17 के जरिए अंतरिक्ष में स्थापित किया जाएगा।
आइए ISRO के इस खास लॉन्च से जुड़ी बड़ी बातों पर एक नजर डालते हैं।
1. देश की तीसरी आंख EOS-5 क्यों है खास?
इस मिशन के तहत अंतरिक्ष में भेजे जा रहे सैटेलाइट का नाम 'EOS-5' है। यह पृथ्वी की सतह से लगभग 36000 किलोमीटर की ऊंचाई से भारत पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रख सकता है।
2. कहां से और कैसे लॉन्च होगा EOS-5?
इस सैटेलाइट को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से 'सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट' में स्थापित किया जाएगा।
3. कैसे होगी 'हॉक आई' की वापसी?
इस बात को ऐसे समझिए कि अगर यह मिशन सफल होता है, तो भारत के पास अपनी सीमाओं, समुद्र तटों, मौसम प्रणालियों और आपदा संभावित (आसानी से बाढ़ या भूकंप वाले) क्षेत्रों पर चौबीसों घंटे सीधी नजर रखने की ताकत आ जाएगी। इसमें लगी हाई-रिजॉल्यूशन कैमरा तकनीक सीमाओं की सुरक्षा को और मजबूत करेगी।
4. जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट का पहला इमेजिंग सैटेलाइट
गौर करने वाली बात यह है कि EOS-5 जियोसिंक्रोनस कक्षा से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट है, जो देश की अंतरिक्ष निगरानी क्षमता को एक नई ऊंचाई देगा। इसका कुल वजन लगभग 2367 किलोग्राम है, जो इसे एक भारी-भरकम और ताकतवर पेलोड बनाता है।
5. विशालकाय रॉकेट GSLV-F17
इस मिशन को ले जाने वाला GSLV-F17 रॉकेट करीब 51.7 मीटर लंबा है और इसका कुल वजन 420.5 टन है। यह भारत के सबसे बड़े और ताकतवर ऑपरेशनल रॉकेटों में गिना जाता है।
6. तीन चरणों की बड़ी ताकत
गौर करने वाली बात यह भी है कि इस रॉकेट में तीन चरणों वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसके ऊपर 4 मीटर चौड़ाई वाला फेयरिंग लगा है ताकि इतने बड़े सैटेलाइट को सुरक्षित रखा जा सके।
7. पहले चरण में क्या होगा है?
रॉकेट के पहले चरण में एक विशाल S-139 सॉलिड रॉकेट मोटर और चार लिक्विड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर लगे हैं। अकेले S-139 में 138 टन सॉलिड ईंधन होता है, जबकि चारों स्ट्रैप-ऑन में मिलकर लगभग 170 टन लिक्विड ईंधन (UH25 और नाइट्रोजन टेट्रोक्साइड) होता है, जो रॉकेट को आसमान में उठाने के लिए जबरदस्त ताकत देता है।
8. दूसरे चरण के बारे में जानिए
पहले चरण के अलग होने के बाद, दूसरा चरण कमान संभालता है। इसमें 42 टन लिक्विड ईंधन होता है, जो रॉकेट को उसकी तय कक्षा की तरफ तेजी से आगे बढ़ाता है।
9. तीसरा और सबसे अहम चरण
इस रॉकेट का आखिरी और तीसरा चरण स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज CUS-5 है। यह लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन पर चलता है। इसमें 15 टन क्रायोजेनिक ईंधन होता है, जो EOS-5 सैटेलाइट को उसकी सही कक्षा में स्थापित करने का सबसे जोखिम भरा और महत्वपूर्ण काम पूरा करता है।
10. सुरक्षित लॉन्चिंग
इस बात को ऐसे समझिए कि लॉन्च के वक्त पूरा सैटेलाइट रॉकेट के सुरक्षा कवच के अंदर सुरक्षित रहता है और क्रायोजेनिक चरण का काम पूरा होने के बाद इसे अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक छोड़ दिया जाता है।
अंतरिक्ष में भारत की छलांग
गौरतलब है कि यह मिशन न सिर्फ इसरो के लिए मनोबल बढ़ाने वाला है, बल्कि देश की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और मौसम की सटीक जानकारी के लिहाज से भी एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
