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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 29, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

दिल्ली में ‘एक मुलाकात मंटो से’, इस कलाकार ने ‘राजी’ में भी बटोरी थी प्रशंसा

By Amit SinghEdited By:
Published: Sat, 29 Dec 2018 12:57 PM (IST)Updated: Sat, 29 Dec 2018 10:42 PM (IST)

‘एक मुलाकात मंटो से’ के देश-विदेश में 50 से अधिक शोज करने वाले अश्वथ भट्ट, जनवरी 2019 में दस साल ...और पढ़ें

दिल्ली में ‘एक मुलाकात मंटो से’, इस कलाकार ने ‘राजी’ में भी बटोरी थी प्रशंसा
दिल्ली में ‘एक मुलाकात मंटो से’, इस कलाकार ने ‘राजी’ में भी बटोरी थी प्रशंसा

नई दिल्ली [अंशु सिंह]। फिल्म ‘राजी’ में दर्शकों की प्रशंसा बटोरने के बाद स्क्रीन एवं स्टेज आर्टिस्ट अश्वथ भट्ट जल्द ही ‘केसरी’ में एक बिल्कुल अलहदा भूमिका में नजर आने वाले हैं। इसके अलावा, वे दीपा मेहता की वेब सीरीज ‘लैला’ से वेब टेलीविजन की दुनिया में कदम रखने जा रहे हैं। हालांकि, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के इस एलुमिनस का दिल बसता है नाटकों में, जो उनके लिए एक खुराक की तरह है।

बीते सालों में अपने एकल नाटक,‘एक मुलाकात मंटो से’ के देश-विदेश में 50 से अधिक शोज करने वाले अश्वथ भट्ट, दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में जनवरी 2019 में दस साल बाद दोबारा से अपने इस प्ले के साथ लौट रहे हैं। पुणे और जयपुर फिल्‍म फेस्‍टीवल में इनकी फिल्‍म 'रक्‍कोश' की जनवरी 2019 में स्‍क्रीनिंग होगी।  आइए मिलते हैं रंगमंच पर सआदत हसन मंटो की शख्सियत को जीते अश्वथ भट्ट से।

 

दशक बीत गए हैं...एक मुलाकात मंटो से...करते हुए। क्या वजह है?
अश्वथ भट्ट कहते हैं, अव्वल तो मुझे समझ में नहीं आता है कि लोग शो बंद ही क्यों करते हैं? विदेश में हजारों शोज होते हैं, लेकिन हम पता नहीं क्यों 10-20 शोज करके ही थक जाते हैं। थियेटर की यही तो खूबसूरती है कि इसकी ऑडिएंस हर दिन बदलती और बढ़ती रहती है। दस-पंद्रह सालों में बच्चे बड़े हो गए हैं। लोग बदल गए हैं। यूं कहें कि 15-16 सालों में एक पूरी पीढ़ी बदल गई है। मैंने तब मंटो करना शुरू किया था, जब उनकी कम ही चर्चा होती थी। आज तो वे हर ओर फिजाओं में घूम रहे हैं। उनकी फिल्में आई हैं। असल में लोग मंटो की कहानियां करते हैं। उनका ड्रामैटिक एडैप्टेशन करते हैं। मेरे नाटक में मंटो की बातें हैं, न कि सिर्फ एडैप्टेशन। इससे लोगों को मंटो की कहानियां नहीं, उनके बारे में पता चलता है। मैं तब तक मंटो करता रहूंगा, जब तक शरीर में जान है। खुशी है कि जॉर्डन के हकाया फेस्टिवल, ब्रिटेन के नॉर्डन फार्म एक्ट सेंटर, जर्मनी के भारतीय दूतावास और पाकिस्तान के लाहौर स्थित वर्ल्ड पऱफॉर्मिंग आर्ट्स फेस्टिवल में इसे मंचित कर सका हूं।

नाटक के दौरान आप कभी स्वयं मंटो होते हैं, कभी कोई तीसरा शख्स। कैसे बनता है यह तालमेल?
अश्वथ कहते हैं, कई साल लगे हैं इस तालमेल को बनाने में। थोड़ा संघर्ष करना पड़ा, क्योंकि आर्टिकल्स ऐसे थे कि कहीं सअदात हसन मंटो की बात हो रही थी, कहीं मंटो खुद ही बात कर रहे थे, तो कहीं वह दुनिया की बातें कर रहे हैं। इसलिए मैंने नाटक के मध्य में जान-बूझकर अंतराल (ब्रेक) लिए हैं, जिसे ड्रामैटिक डिवाइसेज कहते हैं। दरअसल, मंटो ऐसी शख्सियत थे, जिनके सामने घटने वाली हर घटना अफसाना बन जाती थी। फिर वह बात घर की हो या बाहरी दुनिया की। इसलिए नाटक में बहुत से वेरिएशन हैं।

क्या मंटो को साहित्य बिरादरी में वह स्थान मिल पाएगा,जिसके वे हकदार थे?
मंटो को जिन्दा रहते फर्क नहीं पड़ा कि उन्हें कोई स्वीकार कर रहा है या नहीं...। उन्होंने वह लिखा, जो उनका मन हुआ। उन्हें तकलीफ सिर्फ इस बात की थी कि उन्हें नकलची, झूठा, अश्लील लेखक कहा गया। वे कहते थे कि बेशक उनकी कहानियों को पसंद न करें, लेकिन ये न कहें कि उनमें अदब नहीं है। मंटो आवाम के थे। उनके दीवाने कल भी थे। उनके दीवाने आज भी हैं। आगे भी होंगे। ये सिर्फ विडंबना है कि हर वह शख्स, जो वक्त से आगे का होता है, उसको सम्मान एवं मान्यता मिलने में सदियां या बहुत साल लग जाते हैं।

आज के नए लेखकों के ऊपर भी आरोप लगते हैं। क्या कहना चाहेंगे?
देखिए,अमिताभ घोष का क्लास उनका ही रहेगा, चाहे आप कुछ भी कर लीजिए। वहीं, कुछ पल्प संस्कृति में लिखते हैं, वे कुछ भी लिख रहे हैं। छंटनी करने में वक्त लगता है। चेतन भगत का अपना अस्तित्व है, अमिताभ घोष का अपना। पसंद पाठकों की है। लेकिन कुछ क्लासिक्स होती हैं, जो लंबे अर्से तक आपके जहन में रहती हैं। बिना पढ़े किसी के बारे में विचार बनाना तो गलत है। जैसे हिन्दी सिनेमा को ही लें। वहां फिर से एक्टर और कंटेंट का दौर लौट रहा है। 2018 सबसे बड़ा गवाह है इसका। बड़े बजट की फिल्में पिट गईं।

सिनेमा के दर्शकों को वेब सीरीज काफी लुभा रही है। आप भी दीपा मेहता का प्रोजेक्ट कर रहे।
जी। नेट फ्लिक्स या अमेजन प्राइम के आने से निश्चित तौर पर चीजें बदली हैं। दर्शकों को सस्ते में अच्छा कंटेंट देखने को मिल रहा है। मैंने भी एक नई शुरुआत की है ‘लैला’ से, जिसमें डिस्टोपियन वर्ल्ड यानी 2040 आसपास की कहानी है, जिसमें वर्तमान समय के ऊपर प्रहार है।

अब ‘राजी’ के बाद आप ‘केसरी’ में रू-ब-रू होंगे। क्या भूमिका है?
यह एक वॉर फिल्म है, जिसमें गुल बादशाह खान का मेरा किरदार है, जो अक्षय कुमार के विरोध में होता है। काफी चैलेंजिंग था मेरे लिए। एकदम से नया भी। बहुत से लुक टेस्ट हुए। लेकिन मजा आया। घुड़सवारी के अलावा पश्तो भाषा सीखी। उसकी क्लासेज हुईं थीं। मैं अपनी संतुष्टि के लिए वॉर का इतिहास भी पढ़ा।

नए साल में क्या और नया कर रहे हैं?
कुछ फिल्में हैं। साथ ही, अभिषेक मजूमदार जी के साथ ‘ईदगाह के जिन्न’ नामक नाटक कर रहा हूं, जिसका मंचन जयपुर में होना है। वहीं, तनिष्ठा चटर्जी एवं संजय मिश्रा के साथ ‘राकोश’ फिल्म आने वाली है। इसकी, पुणे एवं जयपुर फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग हो चुकी है। यह बहुत ही एक्सपेरिमेंटल फिल्म है,जिसका निर्देशन फिल्म ‘क्वीन’ के एडिटर अभिजीत कोकाटे ने किया है। इसका काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। कश्मीर पर एक डॉक्यूमेंट्री भी एडिट कर रहा हूं। और सबसे अहम कि मंटो को ईरान ले जाने की योजना है।

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