'दरवाजों के अंदर सुलझाएं मतभेद, सार्वजनिक न करें'; टाटा बोर्डरूम विवाद पर बोलीं निर्मला सीतारमण
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा समूह से अपने आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक न कर बंद दरवाजों के पीछे सुलझाने का आग्रह किया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। (फोटो- पीटीआई।)
HighLights
वित्त मंत्री ने टाटा समूह से निजी सुलह का आग्रह किया।
विवाद को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संवेदनशील बताया गया।
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच गहरे मतभेद जारी हैं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा समूह के नेतृत्व से आग्रह किया है कि वे अपने मतभेदों को बंद दरवाजों के पीछे सुलझा लें। उन्होंने कहा कि टाटा संस और उसके सबसे बड़े शेयरधारक, टाटा ट्रस्ट्स के बीच का विवाद एक संवेदनशील मामला है, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। इसलिए इसे सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने देना चाहिए।
मुंबई में सोमवार को सीतारमण ने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या सरकार इसमें दखल देगी या दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश करेगी। उन्होंने कहा कि इन मतभेदों को सुलझाने के लिए इसमें शामिल लोगों के बीच व्यावसायिक सूझबूझ और सौहार्दपूर्ण रवैये की जरूरत है।
'मैं जानती हूं टाटा की ब्रांड वैल्यू'
वित्त मंत्री ने कहा, "मुझे लगता है कि ये बहुत ही नाजुक मामले हैं और ऐसे मामले हैं जिनमें काफी व्यावसायिक सूझ-बूझ की जरूरत होगी। इसमें आपसी सौहार्द और अच्छे कारोबारी रिश्तों की भी भूमिका होगी। इसलिए, मामला चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो मैं तुरंत कोई बात नहीं कहूंगी। मैं टाटा की ब्रांड वैल्यू को जानती हूं और यह भी जानती हूं कि टाटा को एक बड़ा वैश्विक ब्रांड बनाने में पारसी समुदाय का कितना बड़ा योगदान रहा है।"
उन्होंने दोनों पक्षों से आग्रह किया कि वे अपने मतभेदों को सार्वजनिक टकराव का मुद्दा बनने देने के बजाय आपस में बातचीत करें।
'सार्वजनिक रूप से बाहर नहीं आने चाहिए मतभेद'
वित्त मंत्री ने कहा, "मुझे यह भी पता है कि टाटा समूह किन-किन क्षेत्रों में सक्रिय है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसलिए इसे आपसी सहमति से सुलझा लिया जाना चाहिए। उन्हें आपस में बातचीत करके यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्थिति जल्द से जल्द सामान्य हो जाए। यह मामला इस तरह सार्वजनिक रूप से बाहर नहीं आना चाहिए। नेतृत्व की परिपक्वता को देखते हुए हम यही चाहेंगे कि यह मामला जल्द से जल्द सुलझ जाए। यही मेरी राय है।"
क्या है पूरा मामला?
उनकी ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब 158 साल पुराने इस समूह के भीतर मतभेद चल रहे हैं। चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व वाले टाटा संस और नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स के बीच असहमति कई महीनों से पनप रही थी, जो 17 सितंबर को हुई एक बोर्ड बैठक में सबके सामने आ गई।
मतभेद के दो मुख्य मुद्दे हैं। पहला टाटा संस की प्रस्तावित लिस्टिंग और दूसरा चंद्रशेखरन का चेयरमैन बने रहना। ये घटनाक्रम भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के एक संदेश के बाद सामने आए, जिसमें आरबीआई ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर अपना पंजीकरण रद करने की मांग को खारिज कर दिया था।
आरबीआई का संदेश मिलने के एक हफ्ते के भीतर ही टाटा संस के बोर्ड ने केंद्रीय बैंक के निर्देश के अनुसार कंपनी को लिस्ट कराने का फैसला किया। बोर्ड ने चंद्रशेखरन को चेयरमैन के पद पर फिर से नियुक्त करने को भी मंजूरी दे दी।
नोएल टाटा अकेले ऐसे निदेशक थे जिन्होंने इन फैसलों के खिलाफ वोट दिया। टाटा ट्रस्ट्स का प्रतिनिधित्व करने वाले दूसरे नामित निदेशक, वेणु श्रीनिवासन ने अलग रुख अपनाते हुए बहुमत का समर्थन किया।
वहीं, वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) में दोबारा ट्रस्टी बनने की मांग नहीं करने का फैसला किया है। उनका मौजूदा कार्यकाल नौ नवंबर को समाप्त होने जा रहा है।
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और मुख्य कार्यकारी सिद्धार्थ शर्मा को सोमवार को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि पुनर्नियुक्ति के लिए सभी साथी न्यासियों का समर्थन जरूरी है। पद पर बने रहने की मांग से उनकी स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
ट्रस्टियों वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह के नोएल के खिलाफ एकजुट होने के बीच 17 सितंबर की टाटा संस बोर्ड की बैठक में मतभेद खुलकर सामने आए। सूचीबद्धता के मुद्दे पर नोएल अकेले असहमत थे, जबकि श्रीनिवासन ने टाटा संस का साथ दिया। पत्र में खंबाटा ने बैठक के तरीके की आलोचना की और इसे 'कलंक का दिन' बताया, जिससे टाटा संस की प्रतिष्ठा और भारतीय कारोबारी जगत की छवि को नुकसान पहुंचा।
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