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नीति आयोग की रिपोर्ट: प्रशासनिक उलझनों और फंडिंग की देरी से जूझ रहे भारतीय वैज्ञानिक

Updated: Tue, 25 Aug 2026 02:00 AM (IST)

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वैज्ञानिक प्रशासनिक उलझनों, फंडिंग में देरी और नौकरशाही की वजह से रिसर्च में पूरा समय नहीं दे पा रहे हैं।

नीति आयोग की रिपोर्ट।

नीति आयोग की रिपोर्ट।

HighLights

  1. वैज्ञानिकों को प्रशासनिक उलझनों और फंडिंग देरी का सामना।

  2. R&D इकोसिस्टम में भरोसे की कमी, कम शोधकर्ता।

  3. रिपोर्ट ने समाधान सुझाए: स्वायत्तता, तेज ग्रांट प्रक्रिया।

डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु। भारत भले ही ज्यादा रिसर्च पेपर और स्टार्टअप बना रहा हो, लेकिन वैज्ञानिक अभी भी उस सिस्टम से निपटने में बहुत ज्यादा समय बिता रहे हैं जो असल में उनके काम में मदद के लिए बनाया गया था।

रिसर्च एंड डेवलपमेंट को आसान बनाने पर नीति आयोग की एक नई रिपोर्ट में उन दिक्कतों का जिक्र है जिनका सामना रिसर्च करने वालों को करना पड़ता है। इनमें बार-बार ग्रांट के लिए आवेदन करना, फंड मिलने में देरी, सामान खरीदने की मुश्किल प्रक्रिया, खाली पद और बहुत ज्यादा एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल जैसी बातें शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के R&D इकोसिस्टम में R&D प्रोजेक्ट के लिए ग्रांट देने वाली एजेंसी और रिसर्च करने वालों के बीच भरोसे की भारी कमी है, जिसकी वजह से वैज्ञानिक अपना समय पूरी तरह से रिसर्च में नहीं लगा पाते।

रिपोर्ट में लिखा है, 'रिसर्च करने वाले अक्सर एडमिनिस्ट्रेटिव मुद्दों की चिंता किए बिना अपना समय पूरी तरह से R&D गतिविधियों में नहीं लगा पाते। क्षमता से जुड़ी दिक्कतें और साइंस एडमिनिस्ट्रेशन सिस्टम में सख्ती भी है, जो ज्यादातर संस्थानों के अंदरूनी मामले हैं।'

पैसे से शुरू होती है समस्या

भारत अपनी GDP का 0.6% R&D पर खर्च करता है, जो एक दशक से ज्यादा समय से एक जैसा बना हुआ है। ग्रांट के लिए कॉम्पिटिशन भी बढ़ गया है। कई एजेंसियों में आवेदन और ग्रांट मिलने का अनुपात 10% से भी कम हो गया है, जबकि भारत का 64% R&D खर्च पब्लिक सेक्टर से आता है, जो प्राइवेट सेक्टर की कम भागीदारी को दिखाता है।

मंजूर हो चुके प्रोजेक्ट भी इंतजार करते रहते हैं। साइंटिफिक फैसले के बाद मंजूर की गई ग्रांट मिलने में 3-6 महीने लग सकते हैं, जिससे कुल समय एक साल या उससे ज्यादा हो जाता है। साल के आखिर में फंड वापस ले लिए जाते हैं और बाद में दोबारा दिए जाते हैं, जिससे प्रोजेक्ट और फेलोशिप पेमेंट में रुकावट आती है।

ह्यूमन रिसोर्स भी एक कमजोर कड़ी

भारत में प्रति दस लाख लोगों पर सिर्फ 262 फुल-टाइम रिसर्चर हैं, जबकि चीन में यह संख्या 1,585 और अमेरिका व यूके में 4,821 है। पोस्ट-डॉक्टरल इकोसिस्टम भी कमजोर है, जिसमें हर साल सिर्फ 2,500 फेलोशिप मिलती हैं, और PhD स्कॉलर की पहली किस्त मिलने में 4-5 महीने लग सकते हैं। मंजूर किए गए पद अक्सर खाली रहते हैं, क्योंकि संस्थान उन्हें जरूरत के हिसाब से दूसरी जगह नहीं लगा पाते।

संस्थानों के अंदर, वैज्ञानिक अक्सर ऐसे काम करते हैं जो प्रोफेशनल रिसर्च एडमिनिस्ट्रेटर के होने चाहिए, क्योंकि कई संस्थानों में R&D के लिए अलग से कोई ऑफिस नहीं होता और मंजूरी देने का काम सेंट्रलाइज्ड होता है।

भारत पब्लिकेशन और पेटेंट के मामले में तो अच्छा करता है, लेकिन टेक्नोलॉजी-ट्रांसफर का कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर इन्हें प्रोडक्ट में बदलने की राह में रुकावट बनता है, यह बोझ उन संस्थानों पर सबसे ज्यादा पड़ता है जो टॉप लेवल के संस्थान नहीं हैं, क्योंकि उन्हें जर्नल की ज्यादा कीमत और पढ़ाने का भारी बोझ उठाना पड़ता है।

फंडिंग के एक जगह जमा होना भी समस्या

रिपोर्ट में फंडिंग के एक जगह जमा होने की समस्या की ओर इशारा किया गया है। इसमें कहा गया है कि उदाहरण के लिए, IIT सिस्टम को ANRF की R&D फंडिंग का 80% से ज्यादा हिस्सा मिलता है। हालांकि R&D फंडिंग में एकसमानता की न तो उम्मीद की जाती है और न ही यह जरूरी है, लेकिन कुछ चुनिंदा संस्थानों में ही फंडिंग का बहुत ज्यादा जमावड़ा होने से दूसरे R&D संस्थानों और HEI में काम करने वाले रिसर्चर्स के लिए फंडिंग के मौके कम हो जाते हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि ANRF का एक खास मकसद राज्य के संस्थानों में R&D को सपोर्ट करना है, लेकिन यह लक्ष्य अभी बहुत दूर है।

स्टाइपेंड मिलने में होती है देरी- जयंत मूर्ति

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के पूर्व डायरेक्टर प्रोफेसर जयंत मूर्ति ने कहा कि पैसा सबसे बड़ी रुकावट नहीं है। उन्होंने बताया कि PhD स्टाइपेंड के लिए पूरा बजट होता है, फिर भी बिना किसी वजह के उनमें अक्सर देरी होती है। उन्होंने कहा कि पैसा तो तय होता है, लेकिन आप उन्हें पेमेंट नहीं करते हैं।

उनका तर्क था कि ग्रांट मंजूर होने के बाद बहुत ज्यादा समय कागजी कार्रवाई और ऑडिट में बर्बाद होता है, जिसमें प्रोजेक्ट खत्म होने के सालों बाद भी साइंटिस्ट्स को परेशान किया जाता है। उनका मानना है कि यह काम एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ का होना चाहिए, न कि रिसर्चर्स का।

रिपोर्ट का समाधान सिर्फ ज्यादा पैसा देना नहीं है। इसमें भरोसे और नतीजों पर आधारित गवर्नेंस मॉडल की मांग की गई है, जिसे प्रोफेशनल स्टाफ वाले R&D ऑफिस, ज्यादा इंस्टिट्यूशनल ऑटोनॉमी, तेजी से ग्रांट प्रोसेसिंग और मजबूत टेक्नोलॉजी-ट्रांसफर सिस्टम का सपोर्ट मिले, इसका संदेश यह है कि भारत को साइंटिस्ट्स के लिए अपना समय साइंस करने में लगाना आसान बनाना होगा।