फिर चर्चा में चोल राजवंश की नगरी 'पूम्पुहार', पुरातत्व विभाग को 12000 साल पुराने इतिहास के मिले अवशेष
तमिलनाडु के प्राचीन पूम्पुहार शहर में समंदर के भीतर मिली पुरातात्विक खोजों ने चोल वंश के गौरवशाली इतिहास और विदेशी व्यापारिक संबंधों को उजागर किया है।

प्राचीन पूम्पुहार शहर।
HighLights
पुरातत्व विभाग ने पूम्पुहार में समुद्र के भीतर गहन खोज की।
200 से अधिक मिट्टी के बर्तन और प्राचीन संरचनाएं मिलीं।
फारस की खाड़ी और गंगा के मैदानों से व्यापार के प्रमाण।
डिजिटल डेस्क, चेन्नई। तमिलनाडु के प्राचीन और ऐतिहासिक बंदरगाह शहर 'पूम्पुहार' को लेकर एक बहुत ही रोमांचक और बड़ी खबर सामने आई है। यही कारण है कि शुरुआती चोल राजवंश द्वारा बसाया गया और सदियों पहले सुनामी व समुद्री कटाव की वजह से समंदर में समा चुका यह प्राचीन शहर एक बार फिर चर्चा में है।
अब सवाल यह है कि यह शहर अचानक से चर्चा में क्यों आया? तो इसके जवाब को ऐसे समझिए कि हाल ही में तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग की एक टीम ने बंगाल की खाड़ी में समंदर के भीतर दो हफ्ते तक गहन खोजबीन की है। इस दौरान वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के हाथ ऐसे अनमोल सबूत लगे हैं, जो इस शहर के गौरवशाली इतिहास और प्राचीन व्यापारिक रिश्तों की गवाही देते हैं।
समंदर के भीतर क्या-क्या मिला?
जानकारी के अनुसार तट से दो किलोमीटर दूर समंदर की गहराई में 200 से ज्यादा मिट्टी के बर्तन के टुकड़े और प्राचीन संरचनाओं की तस्वीरें मिली हैं। साथ ही इस बार की खोज में 'टॉरपीडो जार' मिले हैं।
ये लंबे और सकरे बर्तन होते थे, जिनका इस्तेमाल प्राचीन काल में फारस की खाड़ी के व्यापार नेटवर्क में शराब और अन्य सामान लाने-ले जाने के लिए किया जाता था।
ईरान और गंगा के मैदानों से कनेक्शन का भी प्रमाण
दूसरी तरफ यहां से ग्लेज्ड पोटरी चिकनी और पॉलिश की हुई मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं, जो प्राचीन ईरान के साथ व्यापारिक संबंधों की ओर इशारा करते हैं। इसके अलावा, पैडल-इम्प्रेस्ड पॉटरी से यह साबित होता है कि पूम्पुहार का व्यापार गंगा के मैदानी इलाकों तक फैला हुआ था। इतना ही नहीं शोधकर्ताओं को चूना पत्थर के अवशेष भी मिले हैं, जिनका संबंध आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध 'अमरावती' के बौद्ध अवशेषों से हो सकता है।
रहस्यमयी अंडाकार संरचना और प्राचीन इतिहास की कहानी
बता दें कि साल 1991 में खोजकर्ताओं ने तट से करीब 5.5 किलोमीटर दूर, 23 मीटर की गहराई में एक बड़ी संरचना का पता लगाया था। बाद में पता चला कि यह 40 मीटर लंबी और 16 मीटर चौड़ी एक अंडाकार संरचना है, जो समुद्र की तलहटी से 2.5 मीटर ऊपर उठी हुई है और पत्थर के बड़े-बड़े ब्लॉकों से बनी है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि इस प्राचीन शहर, जिसे कावेरीपट्टिनम या कावेरीपूमपट्टिनम भी कहा जाता है..इसका जिक्र तमिलनाडु के प्रसिद्ध महाकाव्यों 'सिलप्पतिकारम' और 'मणिमेगलाई' में मिलता है। इसके अलावा ग्रीक-रोमन ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी इसका उल्लेख 'काबोरिस एम्पोरियम' के रूप में मिलता है।
अब समझिए समंदर में कैसे समा गई थी यह नगरी?
पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिकों के मुताबिक, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की यह नगरी भयंकर सुनामी और लगातार समुद्री कटाव की वजह से धीरे-धीरे पानी में डूब गई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वनागिरी का 'एल्लईअम्मन मंदिर' है, जो साल 1991 तक इस्तेमाल में था, लेकिन आज वह तट से 100 मीटर अंदर समंदर के पानी में जा चुका है।
