राज्यसभा में डिप्टी लीडर की नियुक्ति, पावर और क्या होता है काम? राघव चड्ढा को पद से हटाने पर उठने लगे सवाल
आम आदमी पार्टी (AAP) ने सांसद राघव चड्ढा को राज्यसभा के उपनेता पद से हटाकर डॉ. अशोक कुमार को यह जिम्मेदारी सौंपी है। AAP ने राज्यसभा सचिवालय से राघव क ...और पढ़ें

कैसे होती है राज्यसभा में डिप्टी लीडर की नियुक्ति। (राज्यसभा टीवी)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपने सांसद राघव चड्ढा को राज्यसभा के डिप्टी लीडर के पद से हटा दिया है, उनकी जगह डॉ. अशोक कुमार को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर राघव को बोलने के लिए समय न देने का अनुरोध भी किया है।
बता दें कि कोई भी राजनीतिक दल, लोकसभा या राज्यसभा में अपने किस सांसद को कौन सा पद देगा, यह तय करना पार्टी नेतृत्व का अधिकार होता है।
आइए जानते हैं कि कोई पार्टी राज्यसभा में डिप्टी लीडर कैसे चुनती है, उसका काम क्या होता है, बोलने का समय कैसे तय होता है?
पार्टियां कैसे चुनती हैं डिप्टी लीडर?
कोई भी पार्टी अपने डिप्टी लीडर की नियुक्ति आलाकमान या संसदीय दल की बैठक में तय करती है। यह पूरी तरह पार्टी का अधिकार होता है कि सदन में उसका उप नेता कौन होगा? इसके लिए कोई सार्वजनिक चुनाव नहीं होता है। दल अपने उप नेता चुनकर इसकी सूचना राज्यसभा सचिवालय को दे देता है। इसके साथ ही जब कोई पार्टी किसी सांसद को उप नेता के पद से हटाती है तो इसकी सूचना भी पत्र के माध्यम के राज्यसभा सचिवालय को दी जाती है।

क्या होता है डिप्टी लीडर का काम?
डिप्टी लीडर का मुख्य काम अपने दल के नेता की अनुपस्थिति में सदन में पार्टी का नेतृत्व करना है। वह विधायी कार्यों का कॉर्डिनेशन करता है। यह तय करने में मदद करता कि किसी विषय पर पार्टी का स्टैंड क्या होगा? वह पार्टी सांसदों और राज्यसभा सचिवालय के बीच पुल का काम करता है।
राज्यसभा में कैसे होता है बोलने के समय का आवंटन?
राज्यसभा में बोलने के समय का आवंटन की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। सदन की नियमावली के तहत, किसी भी विषय पर बोलने के लिए समय निर्धारित किया जाता है। इस समय को विभिन्न राजनीतिक दलों की संख्या के आधार पर बांटा जाता है। जिस दल के ज्यादा सांसद होंगे, उस दल को ज्यादा समय मिलेगा।
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पार्टी के नेता सचिवालय को सूची देते हैं कि उक्त विषय पर पार्टी की ओर से कौन बोलेगा, उसी के अनुसार सांसदों को बोलने का समय दिया जाता है। अगर किसी सांसद का नाम उस सूची में नहीं है तो उनके लिए सदन में बोलना बेहद मुश्किल होता है।