क्यों बढ़े चीनी के दाम? एथनॉल नहीं, ये वजहें भी हैं जिम्मेदार; एक्सपर्ट्स ने समझाया पूरा गणित
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए एथनॉल मिश्रण को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना ...और पढ़ें
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सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
गन्ने की खेती का रकबा 4.5 लाख हेक्टेयर घटा।
चीनी का उत्पादन अनुमान से 80 लाख टन कम रहा।
खुदरा बाजार में चीनी 75-80 रुपये प्रति किलो तक।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि एथनॉल की बढ़ती मांग के कारण चीनी उत्पादन प्रभावित हुआ और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा।
हालांकि, चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ इस तर्क को पूरी तस्वीर नहीं मानते। उनका कहना है कि चीनी की मौजूदा कीमतों के पीछे गन्ने की खेती का घटता रकबा, कम उत्पादन, छोटा होता पेराई सत्र, चीनी की जमाखोरी और निर्यात जैसे कई कारण हैं।
एक सुपरमार्केट संचालक के अनुसार, कई जगह खुदरा बाजार में चीनी 75-80 रुपये किलो तक पहुंच गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या एथनॉल ही इसकी सबसे बड़ी वजह है।महाराष्ट्र के पूर्व गन्ना आयुक्त शेखर गायकवाड़ ने कहा कि गन्ने का रकबा और उत्पादन दोनों लगातार घट रहे हैं।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में गन्ने की खेती का रकबा 2022-23 में करीब 59 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में घटकर करीब 54.5 लाख हेक्टेयर रह गया। यानी दो साल में करीब 4.5 लाख हेक्टेयर की कमी आई। इसी अवधि में गन्ने का कुल उत्पादन भी करीब 49 करोड़ टन से घटकर करीब 45.3 करोड़ टन रह गया।
इसका सीधा असर चीनी की उपलब्धता पर पड़ना स्वाभाविक है।गायकवाड़ के अनुसार, गन्ने और चीनी उत्पादन को बढ़ाने के लिए बनाई गई किसी नई नीति का असर तुरंत नहीं दिखेगा। इसके लिए कम से कम तीन साल लग सकते हैं। इसलिए सरकार को चीनी के उत्पादन और उपलब्ध स्टाक पर लगातार नजर रखनी होगी।
पेराई का मौसम भी हुआ छोटा
कोआपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज की नेशनल फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने कहा कि महाराष्ट्र में भी चीनी मिलों का पेराई सत्र छोटा हो गया है। जिन मिलों में पहले करीब 150 दिन तक पेराई होती थी, वहां अब यह अवधि करीब 100 दिन रह गई है। उनके मुताबिक, गन्ना किसानों को मिलने वाला उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) और चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलों के लिए आर्थिक दबाव पैदा कर रहा है।
मौजूदा एफआरपी करीब 3,600 रुपये प्रति टन है, जबकि चीनी का एमएसपी 3,100 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास है। दोनों की इकाइयां अलग होने के कारण इस अंतर की तुलना सावधानी से करनी चाहिए, लेकिन मिलों की लागत और बिक्री मूल्य के बीच दबाव जरूर है।पश्चिम भारत चीनी मिल संघ के अध्यक्ष भैरवनाथ थोंब्रे ने भी एथनॉल को चीनी की महंगाई का मुख्य कारण मानने से इन्कार किया।
उन्होंने कहा कि 2020 में एथनॉल का बड़ा हिस्सा चीनी के डायवर्जन से बनता था, जबकि अब इसमें अनाज की हिस्सेदारी काफी बढ़ गई है।उन्होंने कहा कि उत्पादन के शुरुआती अनुमान और वास्तविक उत्पादन में बड़ा अंतर भी बाजार पर भारी पड़ा। शुरुआती अनुमान करीब 390 लाख टन चीनी उत्पादन का था, लेकिन उत्पादन करीब 310 लाख टन तक ही रह गया।
यानी अनुमान से लगभग 80 लाख टन कम चीनी बनी। इसके बावजूद आठ लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई, जिसका असर घरेलू उपलब्धता पर पड़ा।थोंब्रे के अनुसार, मौसम को लेकर आशंकाओं के बीच व्यापारियों ने भी बड़ी मात्रा में चीनी खरीदकर स्टाक की, जिससे कीमतों पर और दबाव बढ़ा। सरकार ने अब चीनी की बिक्री और स्टाक को लेकर कुछ नियम लागू किए हैं।
