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नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर लगेगी लगाम? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा कानूनी समाधान

Published: Tue, 29 Sep 2026 02:00 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए एक कानूनी ढांचा तलाशने को कहा है। इसका उद्देश्य ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा पर जताई चिंता (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा पर जताई चिंता (फाइल फोटो)

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह इस बात की संभावना तलाशे कि क्या इंटरनेट मीडिया मध्यस्थों के लिए ऐसा कानूनी ढांचा बनाया जा सकता है ताकि सोशल मीडिया मध्यस्थ और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म नाबालिगों से जुड़े भारतीय कानूनों का पालन करें।

इन कानूनों में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया अकांउट बनाने पर लगी कानूनी रोक भी शामिल है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 10 सितंबर को याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन ‘जस्ट राइट्स फार चिल्ड्रन अलायंस’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस. फुल्का की दलीलों का संज्ञान लिया था और इस याचिका पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी तथा कानून एवं न्याय मंत्रालयों से जवाब मांगा था।

याचिका में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले नाबालिगों के लिए सुरक्षा उपाय और यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया कि कोई भी प्लेटफार्म 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ अनुबंध न करे। सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता की सहमति जरूरी हो। अभिभावक की पहचान के लिए ई केवाईसी का प्रविधान हो।

सोमवार को सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार को पीठ से कहा, सरकार इस मुद्दे पर गौर करेगी और उचित कदम उठाएगी।

फुल्का ने कहा कि मौजूदा भारतीय कानून के तहत नाबालिगों द्वारा किए गए अनुबंध अमान्य होते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिए केवल स्वैच्छिक दिशानिर्देशों के बजाय ऐसे बाध्यकारी दायित्व तय किए जाने चाहिए, जिनका पालन सुनिश्चित किया जा सके।

जस्टिस बागची ने कहा कि यह केवल दिशानिर्देश तक सीमित न रहे। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से इस पर गौर करने को कहा कि क्या इसे मध्यस्थों संबंधी नियमों के तहत वैधानिक प्रविधान के रूप में शामिल किया जा सकता है।

जस्टिस बागची ने सॉलिसिटर जनरल से कहा, मध्यस्थ संबंधी नियमों के तहत निर्देश जारी करें कि वे अपने सॉफ्टवेयर या प्लेटफॉर्म को भारतीय कानून के अनुरूप तैयार करें। साफ्टवेयर को भारतीय कानून के अनुरूप होना चाहिए। फुल्का ने कहा कि प्रस्तावित डाटा संरक्षण फ्रेमवर्क का इंतजार करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मौजूदा कानून नाबालिगों के अनुबंध करने पर रोक लगाता है।

याचिका में कहा गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट (भारत) जैसे प्लेटफॉर्म 13 वर्ष की उम्र से यूजर्स को अकाउंट बनाने की अनुमति देते हैं, जबकि भारतीय कानून 18 वर्ष से कम उम्र वालों को नाबालिग मानता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े कंटेंट को फैलाने और स्टोर करने पर रोक लगाने वाले कड़े दंडात्मक प्रविधानों के बावजूद, इंटरनेट प्लेटफार्म आटोमेटेड कंटेंट-फिल्टरिंग टूल और उम्र की पुष्टि करने वाले सिस्टम लागू करने में नाकाम रहे हैं।

(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)