'इसमें तो कोई जांच ही नहीं हुई', बिहार के 25 साल पुराने मर्डर केस को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने 2001 के एक हत्या मामले में बिहार पुलिस के सबूतों को खारिज करते हुए छह आरोपियों को बरी कर दिया।

25 साल पुराने हत्या के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज। (फाइल फोटो।)
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने 2001 के हत्या मामले में छह आरोपियों को बरी किया।
बिहार पुलिस के सबूतों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया।
जांच की कमी और अविश्वसनीय गवाहों के बयानों पर सवाल।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 2001 में दिन-दहाड़े अंधाधुंध फायरिंग में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बिहार पुलिस ने 6 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल कोर्ट और पटना हाई कोर्ट में अपना केस साबित भी कर दिया था लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस के उन सबूतों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने आरोपियों को बरी करने में एक दशक से ज्यादा का समय लगा दिया और नतीजा निकाला कि इस मामले में तो कोई जांच ही नहीं हुई थी।
बहुत धीमी गति से चलने वाली कानूनी प्रक्रिया के कारण एक आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई और 2015 में हाई कोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई उम्रकैद की सज़ा काटनी पड़ी। बाकी पांच दोषियों ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की थी। उन्हें बरी करते हुए जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "इस मामले में सबूतों की पूरी तरह कमी है और (प्रत्यक्षदर्शियों के) बयान भरोसे के लायक नहीं हैं।"
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद खड़े हुए सवाल
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि यह मामला खराब जांच का नहीं, बल्कि जांच न होने का है, यह संकेत देती है कि ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट ने सबूतों पर विचार करते समय सही और गलत के बीच अंतर करने में शायद समझदारी नहीं दिखाई। वरना, यह समझना मुश्किल है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताई गई सबूतों की भारी कमी दो अदालती स्तरों की जांच से कैसे बच गई।
जजों ने क्या कहा?
जस्टिस पारडीवाला और चंद्रन ने कहा कि उन्हें पता है कि आरोपी खराब जांच का फायदा नहीं उठा सकते, लेकिन उन्होंने आगे कहा, "जब कोई भरोसेमंद सबूत न हो तो सिर्फ इसलिए कि जांच अधिकारी (IO) असहयोगी था या उस पर मिलीभगत का आरोप था कोर्ट आरोपी को दोषी नहीं मान सकता।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध बिना किसी शक के साबित कर सके। जैसा कि हमने देखा प्रत्यक्षदर्शी का बयान भरोसे के लायक नहीं है और न ही कोई ऐसी चीज बरामद या जब्त की गई जैसी कि सही जांच में की जाती है।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा बताया गया हत्या का मकसद कमजोर था, घटना कैसे हुई इस पर गवाह के बयान के उलट एक विशेषज्ञ की मेडिकल राय थी और अपराध स्थल से कोई हथियार या कारतूस बरामद नहीं हुआ, जबकि गवाहों का दावा था कि आरोपी ने अंधाधुंध गोलीबारी की थी।
'हम बयान पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं'
बेंच ने चश्मदीद गवाह के उस बयान पर यकीन नहीं किया जिसमें कहा गया था कि हमलावर पीछे से आए और पैदल चल रहे पीड़ित पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। बेंच ने कहा, "विशेषज्ञों की राय और घाव की प्रकृति से मिले संकेतों से पता चलता है कि पीड़ित बैठा हुआ था और गोली बहुत करीब से चलाई गई थी। इसी वजह से हम चश्मदीद गवाह के बयान पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं।"
