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'फैसलों पर रोक लगा सकते हैं', मतभेद के बीच चुनाव आयोग के निर्णयों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा; बड़ी बातें

Published: Mon, 05 Oct 2026 03:28 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना एकतरफा फैसले लेने ...और पढ़ें

चुनाव आयोग के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बातें।

चुनाव आयोग के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बातें।

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने CEC के एकतरफा फैसलों पर केंद्र और ECI से जवाब मांगा।

  2. याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार पर अन्य ECs की मंजूरी के बिना निर्णय लेने का आरोप।

  3. कोर्ट ने कहा, बहुमत या सर्वसम्मति न होने पर फैसलों की सफाई देनी होगी।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक याचिका पर केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और अन्य से जवाब मांगा। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना एकतरफा फैसले लिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, साथ ही चुनाव आयोग की महानिदेशक सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से भी जवाब मांगे गए हैं।

सीजेआई के नेतृत्व वाली बेंच ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा, "हमें नोटिस जारी करना होगा। नोटिस के बाद अगर वे आते हैं और रिपोर्ट से पता चलता है कि चुनाव आयोग का फैसला न तो बहुमत से और न ही सर्वसम्मति से लिया गया था तो उन्हें उन फैसलों के बारे में सफाई देनी होगी।"

याचिका में क्या मांग की गई?

इस याचिका में को वारंटो (अधिकार-पृच्छा) रिट की मांग की गई थी। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने को कहा गया था कि वे किस अधिकार के तहत काम कर रहे हैं और करते आ रहे हैं, मानो वे अकेले ही उस सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति का इस्तेमाल करने के हकदार हों, जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को दी गई है।

क्या है मामला?

दरअसल, एक अंग्रेजी अखबार की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने कई फैसले तब भी लिए जब दो चुनाव आयुक्त उनसे सहमत नहीं थे। जबकि, आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। जब तीनों के बीच आम सहमति नहीं बन पाती तो बहुमत के आधार पर फैसले लिए जाते हैं।

राकेश कुमार सिंह की ओर से कोर्ट में दायर याचिका में सत्ता के लगातार केंद्रीकरण, एजेंडा और बैठकों के मिनट्स (कार्यवृत्त) के न होने या उनमें देरी, वोटर लिस्ट की प्रक्रियाओं में बदलाव और दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना अपील दायर करने का आरोप लगाया गया।

याचिका में उन 14 आपत्तियों का जिक्र किया गया है जो दो चुनाव आयुक्तों ने 28 अक्टूबर, 2025 और 14 अगस्त, 2026 के बीच चुनाव आयोग के नाम पर बिना उनकी मंजूरी के उठाए गए कदमों के खिलाफ दर्ज कराई थीं।

याचिका में क्या कहा गया?

याचिका में कहा गया है, "अगर चुनाव आयोग को एक मल्टी-मेंबर बॉडी के तौर पर संविधान से मिली शक्तियां, असल में या असलियत में आयोग के भीतर ही किसी एक पद द्वारा उस भागीदारी के बिना इस्तेमाल की जा सकती हैं जिसकी जरूरत संविधान और 2023 के कानून में बताई गई है तो वोटर लिस्ट में कौन शामिल होगा और कौन वोट दे सकेगा, यह तय करने वाले फैसलों पर एक गंभीर संवैधानिक सवाल उठता है कि क्या ऐसे फैसले उसी संवैधानिक अथॉरिटी द्वारा लिए जा रहे हैं जिसे संविधान ने इस मकसद के लिए बनाया था।"

याचिका में मांग की गई है कि अगर यह पाया जाता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने 2023 के एक्ट की धारा 18 के तहत कमीशन के फैसले के बिना ऐसी सामूहिक अथॉरिटी का इस्तेमाल किया है या कर रहा है तो अथॉरिटी के ऐसे इस्तेमाल को अमान्य घोषित किया जाना चाहिए।

याचिका में यह घोषणा करने की भी मांग की गई थी कि एसआईआर और इसके तहत की गई सभी कार्रवाइयां, फैसले, निर्देश और उनसे जुड़े उपाय शुरू से ही अमान्य और बिना कानूनी अधिकार के माने जाएं।

बड़ी बातें

  • आज याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट, 2023 की धारा 16 का भी जिक्र किया, जो सीईसी को रिटायर होने के बाद भी सुरक्षा (इम्युनिटी) देती है। सिंह ने तर्क दिया, "यह पहले वाले एक्ट में नहीं था। धारा 16 इसे और भी महत्वपूर्ण बनाती है क्योंकि कानून ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर को बहुत ज्यादा अधिकार दिए हैं।"
  • इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने जवाब दिया, "पद पर रहते हुए सुरक्षा तो हमेशा समझी ही जाती है।" हालांकि, सिंह ने कहा, "लेकिन इसमें है या था लिखा है। यानी पद छोड़ने के बाद भी। किसी भी दूसरे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए ऐसी सुरक्षा की बात कभी नहीं सुनी गई। प्रधानमंत्री को भी ऐसी सुरक्षा नहीं मिलती है।"
  • इस पर जस्टिस बागची ने कहा, "यहां तक कि जज भी नहीं।" सिंह ने सहमति जताई और साफ किया कि वह फिलहाल सेक्शन 16 को चुनौती नहीं दे रहे हैं।
  • इसके बजाय, उन्होंने सीईसी को तुरंत निलंबित करने या उनसे सीईसी के तौर पर काम करने का अधिकार छीनने और उनकी जगह बाकी दो चुनाव आयुक्तों को काम करने की अनुमति देने के लिए अंतरिम आदेश की मांग की।
  • तो सीजेआई कहा, "हमारे पास कोई पक्की जानकारी होनी चाहिए। आइए 10 दिन इंतजार करें।" चुनाव आयोग के जिन फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन्हें रद करने के सवाल पर कोर्ट ने कहा, "अगर फैसलों में कोई गड़बड़ होती है तो हम उन्हें कभी भी रद कर सकते हैं। 1993 का संशोधन और 2023 का एक्ट, दोनों ही इन बातों का जिक्र करते हैं। कामकाज के तरीके पर आम सहमति से फैसला लिया जाना है, जबकि कामकाज बहुमत से हो सकता है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे पहले आम सहमति से फैसला लें। अगर आम सहमति नहीं बनती है, तो जैसा कि सही कहा गया है, बहुमत से फैसला लिया जा सकता है।"
  • इसके बाद सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग ने अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट पर कोई बात नहीं की, बल्कि बहुत ही अस्पष्ट भाषा में एक प्रेस रिलीज जारी की।
  • इस पर सीजेआई कांत ने कहा, "अखबार की रिपोर्ट 100 प्रतिशत सही, आंशिक रूप से सही या आंशिक रूप से गलत हो सकती है। हम आज उस आधार पर कोई आदेश नहीं दे सकते। लेकिन हम निश्चित रूप से इस पर जवाब चाहेंगे। उसके बाद जो भी प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं होंगी, हम उनके लिए आदेश जारी करेंगे।"

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