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    'डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर विचार करे सरकार', सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को सुझाव

    Updated: Tue, 28 Jul 2026 10:51 PM (GMT+05:30)

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से डिजिटल अरेस्ट को आपराधिक कानून में अलग अपराध घोषित कर कड़ी सजा का प्रविधान करने पर विचार करने को कहा है। ...और पढ़ें

    डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर विचार करे सरकार।

    डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर विचार करे सरकार।

    HighLights

    1. सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर विचार करने को कहा।

    2. केंद्र सरकार से साइबर अपराधों के लिए कड़े कानून बनाने का आग्रह।

    3. डीपफेक और ऑनलाइन धोखाधड़ी से निपटने के लिए नया विधेयक तैयार।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से कहा कि बढ़ते साइबर अपराधों को देखते हुए डिजिटल अरेस्ट को आपराधिक कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित करने और इसे अलग अपराध घोषित कर कड़ी सजा का प्रविधान करने पर विचार किया जाए।

    अदालत ने कहा कि पर्याप्त शुरुआती साक्ष्य मिलने पर आरोपितों की संपत्ति फ्रीज करने का कानूनी प्रविधान भी होना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी।

    अदालत ने कहा कि साइबर अपराध लगातार नए रूप ले रहे हैं, इसलिए कानूनों को भी समय के साथ अपडेट करने की जरूरत है।

    क्या है डिजिटल अरेस्ट?

    बता दें कि डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, कोर्ट या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो या ऑडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ित को गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग या अन्य अपराधों का डर दिखाकर घंटों तक ऑनलाइन निगरानी में रखते हैं और पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाते हैं।

    सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि इस संबंध में एक अंतर-विभागीय समिति व्यवस्था की कमियों की समीक्षा कर रही है और जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। उन्होंने कहा कि साइबर अपराध से निपटने के लिए कई सुधारों पर काम चल रहा है।

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    न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने डीपफेक तकनीक के बढ़ते खतरे का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इसका इस्तेमाल पहचान छिपाने और धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे नए अपराधों से निपटने के लिए कानून में स्पष्ट प्रविधान जरूरी हैं।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य ऑनलाइन अपराधों से निपटने के लिए नया विधेयक तैयार कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून में इन अपराधों को लेकर विशेष प्रविधान शामिल किए जा सकते हैं।

    अटार्नी जनरल ने यह भी बताया कि सीबीआई फिलहाल 10 करोड़ या उससे अधिक की ठगी वाले करीब 20 बड़े डिजिटल फ्राड मामलों की जांच कर रही है, जबकि अन्य मामलों की जांच राज्य पुलिस कर रही है।

    उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने का सुझाव भी दिया, ताकि साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले संदिग्ध बैंक खातों पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस मामले में बुधवार को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगा।

    (समाचार एजेंसी आई के इनपुट के साथ)