यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 30, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Assam: असम में स्थायी शांति की दिशा में बढ़े कदम, केंद्र और असम सरकार के साथ उल्फा ने त्रिपक्षीय शांति समझौते पर किए हस्ताक्षर
यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) का तीन दशक से अधिक पुराना सशस्त्र संघर्ष खत्म हो गया है। इसको लेकर पीएम मोदी ने कहा कि आज का दिन असम की शांति और ...और पढ़ें

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) का तीन दशक से अधिक पुराना सशस्त्र संघर्ष खत्म हो गया है। गृह मंत्री अमित शाह और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की उपस्थिति में उल्फा (अरबिंद राजखोवा गुट) के प्रतिनिधियों ने शुक्रवार को त्रिपक्षीय शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया। इसके साथ ही असम स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ गया है।
अमित शाह ने इसे असम के भविष्य के लिए सुनहरा दिन करार दिया
अमित शाह ने इसे असम के भविष्य के लिए सुनहरा दिन करार दिया। अमित शाह ने कहा कि शांति समझौते के बाद उल्फा के 700 सशस्त्र कैडर हथियार डालकर मुख्य धारा में लौट जाएंगे। इसके पहले बोडो, आदिवासी, कार्बी और दीमासा उग्रवादी गुटों के साथ समझौता हो चुका है, जिससे 7,500 से अधिक सशस्त्र कैडर मुख्य धारा में लौट चुके हैं। उल्फा से शांति समझौते के बाद कुल 8200 सशस्त्र कैडर का हथियार छोड़कर मुख्य धारा में लौटना असम में शांति के लिए बड़ी बात है।
असम के लिए बड़े आर्थिक पैकेज का एलान किया जाएगा
अमित शाह के अनुसार, अकेले उल्फा के साथ संघर्ष में 10 हजार से अधिक लोगों की जान गई है, जिनमें सुरक्षा बलों के जवान भी शामिल हैं। शाह ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पूर्वोत्तर भारत और दिल्ली के बीच दूरी कम करने के प्रयासों ने पूरे क्षेत्र में शांति और विकास का नया मार्ग प्रशस्त किया है। अमित शाह ने उल्फा नेताओं को समझौते की शर्तों को 100 प्रतिशत लागू करने का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि पूरे समझौते को लागू किए जाने की केंद्रीय स्तर पर मानिट¨रग की जाएगी और इसके लिए विशेष कमेटी बनाई जाएगी। शाह ने कहा कि जल्द ही समझौते के अनुरूप असम के लिए बड़े आर्थिक पैकेज का एलान किया जाएगा।
12 वर्षों की बातचीत के बाद अब शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो पाया है
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि मोदी सरकार के दौरान असम में आई शांति के कारण 85 प्रतिशत इलाकों से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) हटा लिया गया है। उल्फा के साथ समझौते के बाद जल्द असम पूरी तरह से अफस्पा से मुक्त हो जाएगा। उल्फा के राजखोवा गुट ने 2011 में आपरेशन निलंबित करने का केंद्र और असम सरकार के साथ समझौता किया था। 12 वर्षों की बातचीत के बाद अब शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो पाया है।
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चार वर्षों में नौ समझौते कर बनाई शांति की राह
अमित शाह ने बताया कि पिछले चार वर्षों में पूर्वोत्तर भारत में कुल नौ समझौते कर स्थायी शांति की राह प्रशस्त की गई है। इसमें ब्रू, बोडो, दिमासा, कार्बी, आदिवासी, त्रिपुरा के एनएलएफटी के साथ समझौते के साथ ही असम और अरुणाचल प्रदेश तथा असम और मेघालय के साथ हुए सीमा समझौता शामिल हैं। इन शांति समझौतों की वजह से पूर्वोत्तर भारत में ¨हसक घटनाओं में 73 प्रतिशत, सुरक्षा बलों के जवान की मौत में 71 प्रतिशत और आम नागरिकों की मौत में 86 प्रतिशत की कमी आई है।
परेश बरुआ गुट समझौते का हिस्सा नहीं
परेश बरुआ की अध्यक्षता वाला उल्फा का कट्टरपंथी गुट इस समझौते का हिस्सा नहीं है। ऐसा माना जाता है कि बरुआ चीन-म्यांमार सीमा के पास किसी जगह पर रहता है। उल्फा का गठन ''संप्रभु असम'' की मांग के साथ किया गया था। तीन दशक से अधिक समय से यह ¨हसक गतिविधियों में शामिल रहा है।
हिंसक गतिविधियों से शांति समझौते तक
सात अप्रैल, 1979 : असम के शिवसागर में ऐतिहासिक अहोम-कालीन एंफीथिएटर रंग घर में उल्फा का गठन हुआ।
1980 : कांग्रेस के राजनीतिज्ञों, राज्य के बाहर के व्यापारिक घरानों, चाय बागानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को निशाना बनाकर अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की।
1985-1990: प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व वाली असम गण परिषद सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान असम में अशांति की स्थिति पैदा हो गई। उल्फा ने अपहरण, जबरन वसूली और हत्याओं की कई घटनाओं को अंजाम दिया।
28 नवंबर, 1990 : उल्फा के खिलाफ सेना द्वारा आपरेशन बजरंग शुरू किया गया।
नवंबर 1990 : असम को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया और सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) कानून लागू किया गया। उल्फा को अलगाववादी और गैर-कानूनी संगठन घोषित किया गया।
31 जनवरी, 1991 : आपरेशन बजरंग बंद किया गया।सितंबर, 1991: उल्फा के खिलाफ आपरेशन राइनो शुरू किया गया।
मार्च 1992 : उल्फा दो गुटों में विभाजित हो गया। एक वर्ग ने आत्मसमर्पण कर दिया और खुद को आत्मसमर्पित उल्फा के रूप में संगठित किया।
2004 : उल्फा सरकार से बातचीत के लिए राजी हुआ।सितंबर 2005 : ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखिका इंदिरा गोस्वामी के नेतृत्व में केंद्र के साथ तीन दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई प्रगति नहीं हो पाई।
दिसंबर, 2009 : अरबिंद राजखोवा सहित उल्फा के शीर्ष नेताओं को बांग्लादेश में गिरफ्तार किया गया, भारत प्रत्यर्पित किया गया और गुवाहाटी की जेल में बंद कर दिया गया।
2011: राजखोवा और जेल में बंद अन्य नेता रिहा। उल्फा दो गुटों में विभाजित हो गया-राजखोवा के नेतृत्व वाला उल्फा (वार्ता समर्थक) और परेश बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा (स्वतंत्र)।
अप्रैल 2023 : केंद्र ने उल्फा (वार्ता समर्थक) को प्रस्तावित समझौते का मसौदा भेजा।
29 दिसंबर, 2023 : उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने केंद्र और असम सरकार के साथ त्रिपक्षीय शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए।