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US मिडटर्म चुनाव रिजल्ट: भारत के लिए राहत के साथ चुनौती भी, किन बातों का रखना होगा ध्यान?

By Jaiprakash RanjanEdited By: Garima Singh
Published: Wed, 04 Nov 2026 11:34 PM (IST)

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त से ट्रंप की स्थिति कमजोर हुई है, जिससे भारत को व्यापार और एच-1बी वीजा पर राहत मिल सकती है।

ट्रंप की कमजोर स्थिति से भारत को परोक्ष लाभ

ट्रंप की कमजोर स्थिति से भारत को परोक्ष लाभ

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जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। अमेरिका के 2026 के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के हाउस आफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर नियंत्रण हासिल करने और सीनेट में महत्वपूर्ण बढ़त दर्ज करने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ गई है।

भारत-अमेरिका संबंधों पर इसका सीधा और बड़ा असर तो नहीं पड़ेगा, लेकिन भारतीय उत्पादों पर शुल्क लगाने, व्यापार वार्ता, एच-1बी वीजा जैसे मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन पर निगरानी बढ़ने का परोक्ष तौर पर फायदा निश्चित तौर पर भारत को होगा।

ट्रंप की कमजोर स्थिति से भारत को परोक्ष लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को कुछ क्षेत्रों में सीमित राहत मिल सकती है, जबकि रक्षा और सामरिक साझेदारी पर निरंतरता बनी रहेगी। हालांकि अमेरिकी संसद का नया स्वरूप रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दे या ईरान के साथ संबंधों को लेकर भारत सरकार की चुनौती बढ़ाने वाला भी साबित हो सकता है।

अमेरिका से साफ संकेत आ रहे हैं कि डेमोक्रेटिक नियंत्रित हाउस अब संसदीय समितियों के माध्यम से प्रशासन की नीतियों की जांच कर सकता है, सुनवाई आयोजित कर सकता है और ट्रंप के कुछ महत्वाकांक्षी विधेयकों को धराशायी कर सकता है।

भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों में टैरिफ, रूसी तेल खरीद पर दबाव और एच-1बी वीजा प्रतिबंधों को लेकर तनाव बढ़ा था। फरवरी, 2026 में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा अभी भी अंतिम रूप नहीं ले पाया है।

व्यापार वार्ता पर नहीं चलेगी ट्रंप की

व्यापार और टैरिफ के मोर्चे पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक टैरिफ और रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त दबाव डाला था।

डेमोक्रेट नियंत्रित हाउस इन टैरिफ नीतियों पर सुनवाई व जांच कर सकता है और राष्ट्रपति की टैरिफ लगाने की शक्तियों को सीमित करने के प्रयास कर सकता है। इससे भारत को चल रही व्यापार वार्ताओं में थोड़ी बेहतर सौदेबाजी की स्थिति मिल सकती है।

भारत और अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी लगातार कह रहे हैं कि कारोबारी समझौते को लेकर बातचीत करीब-करीब पूरी हो चुकी है और अब अंतिम रूप दिया जाना शेष है। इसके बावजूद यह याद रखना चाहिए कि ट्रंप के पास वीटो शक्ति और कार्यकारी शक्तियां अभी भी बरकरार हैं।

आईटी पेशेवरों को राहत संभव

अमेरिका का नया समीकरण एच-1बी वीजा और आव्रजन नीति पर भी ट्रंप प्रशासन की बेहद लोकलुभावन व राष्ट्रवादी नीतियों में बदलाव का दबाव बना सकता है।

ट्रंप प्रशासन ने सितंबर, 2025 में कुछ नए एच-1बी आवेदनों पर एक लाख डालर की फीस लगाई थी, जिसे बाद में एक वर्ष और बढ़ा दिया गया। अदालतों ने कुछ मामलों में इस फीस के क्रियान्वयन पर रोक लगाई है।

भारतीय पेशेवर एच-1बी स्वीकृतियों का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। लिहाजा ट्रंप सरकार की उक्त नीतियों का सबसे ज्यादा खामियाजा भारतीय आइटी पेशेवरों पर ही पड़ने की संभावना है। इस डर से ही कई आइटी कंपनियां अपनी अमेरिकी कस्टमर कंपनियों के लिए नई नियुक्तियों पर रोक लगाए हुए हैं।

डेमोक्रेटिक कांग्रेस इस फीस को कानून का रूप देने के किसी भी प्रयास को रोक सकती है और यूएससीआइएस तथा गृह सुरक्षा विभाग की नीतियों पर सख्त निगरानी रख सकती है। रिपब्लिकन नियंत्रित कांग्रेस की स्थिति में ऐसी सख्ती को विधायी समर्थन मिलने की संभावना अधिक थी।

रक्षा व रणनीतिक संबंधों पर असर नहीं

रक्षा, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक सहयोग के क्षेत्र में निरंतरता बने रहने की उम्मीद है। चीन को संतुलित करने की रणनीति, क्वाड सहयोग, रक्षा साझेदारी और सेमीकंडक्टर व कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) जैसे क्षेत्रों में दोनों अमेरिकी दलों का व्यापक समर्थन है।

मिडटर्म नतीजे इन मुद्दों को प्रभावित करने वाले नहीं माने जा रहे। इस महीने मनीला में क्वाड की बैठक होने वाली है और उसके बाद पीएम नरेन्द्र मोदी के दिसंबर, 2026 में अमेरिका जाने की भी संभावना है।

रूस से ऊर्जा खरीद पर बढ़ सकती है सख्ती

रूस संबंधी नीति पर हालांकि डेमोक्रेटिक कांग्रेस अधिक सख्त रुख अपना सकती है, जिससे भारत के ऊर्जा और रक्षा संतुलन पर कुछ अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।

डेमोक्रेट्स परंपरागत रूप से रूस के विरुद्ध ज्यादा कड़ा रुख रखते हैं और यूक्रेन को मजबूत समर्थन देते हैं। ईरान को लेकर भी उनका ऐसा ही रवैया है। उन्होंने पहले से ही रूस व ईरान से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने संबंधी कानून को पूरा समर्थन दिया था।

इस कानून को अक्टूबर, 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने अस्थायी रूप से स्थगित किया है, लेकिन डेमोक्रेट-नियंत्रित कांग्रेस अब ज्यादा सख्ती की मांग कर सकती है। प्रशासन से जवाबदेही मांग सकती है और जरूरत पड़ने पर सख्त प्रतिबंध (टैरिफ) लागू करने का दबाव बढ़ा सकती है।

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