क्यों दुनिया से दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा यूरोप? जानिए इस महाद्वीप के 'हॉट जोन' बनने के बड़े कारण
यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है। वैज्ञानिक इसे लॉन्ग टर्म जलवायु परिवर्तन से जोड़ रहे हैं।

दोगुनी रफ्तार से तप रहा यूरोप (फोटो- AI Generated)
HighLights
यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होता महाद्वीप।
आर्कटिक का पिघलना, स्वच्छ हवा भी बढ़ा रही गर्मी।
गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। यूरोप इन दिनों सिर्फ गर्म नहीं हो रहा, तप रहा है। तापमान के रिकॉर्ड टूट रहे हैं और हीटवेव अब मौसम का अपवाद नहीं, बल्कि एक नया पैटर्न बनती जा रही हैं। लेकिन यूरोप की यह ‘हीट स्टोरी’ आखिर इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
क्या यूरोप की बढ़ती गर्मी के पीछे सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार है या ‘हीट डोम’, गर्म होती समुद्री सतह और बदलते वायुमंडलीय पैटर्न भी तापमान को और ऊपर की तरफ धकेल रहे हैं?
आखिर कौन-से फैक्टर हैं जो यूरोप को तेजी से ‘हॉट जोन’ में बदल रहे हैं और इस बदलते मौसम का आने वाले वक्त में कितना बड़ा असर होगा? चलिए इन-डेप्थ में समझने की कोशिश करते हैं।
सबसे पहले समझते हैं कि यूरोप आखिर 2026 में इतनी तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप कैसे बन गया और इसे लेकर वैज्ञानिक भी क्यों चिंतित हैं।
यूरोप में तेजी से क्यों बढ़ रहा तापमान?
यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है। ऐसा नहीं है कि यहां अचानक इसी साल गर्मी बढ़ी है। वैज्ञानिक इसे लॉन्ग टर्म जलवायु परिवर्तन से जोड़ रहे हैं।
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) के अनुसार, 1990 के दशक के बीच से यूरोप का तापमान लगभग 0.56°C प्रति दशक की दर से बढ़ा है, जो वैश्विक औसत से दोगुने से भी अधिक है। वहीं, दुनिया का औसत तापमान 0.27°C बढ़ा। आसान भाषा में कहें तो यूरोप का तापमान हर दस साल में बढ़ रहा है और पूरी दुनिया के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है।
यूरोप में दुनिया में सबसे ज्यादा तापमान बढ़ने का एक कारण नहीं हैं। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं।

ग्रीनहाउस गैस इफेक्ट से बढ़ती गर्मी
सबसे पहले बात ग्रीनहाउस गैस इफेक्ट की करते हैं। एक ऐसा बदलाव जो पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। वैसे तो ग्रीनहाउस इफेक्ट पृथ्वी पर जीवन के लिए बहुत जरूरी है, अगर वातावरण में ग्रीनहाउस गैसें बिल्कुल न हों, तो पृथ्वी की गर्मी अंतरिक्ष में ज्यादा तेजी से निकल जाएगी और यहां का औसत तापमान जीवन के लिए बहुत कम हो जाएगा।
दिक्कत तब शुरू होती है, जब वातावरण में CO₂ और मीथेन जैसी गैसों की मात्रा बढ़ती जाती है। ये गैसें पृथ्वी से बाहर निकलने वाली गर्मी का कुछ हिस्सा रोक लेती हैं। यानी पृथ्वी गर्म होती जाती है।
अब इसमें एक समस्या है कि यह गर्मी (Warming) हर जगह एक जैसी नहीं होती। यूरोप में जमीन का बड़ा हिस्सा होने के कारण तापमान समुद्र की तुलना में तेजी से बढ़ता है।

हाई प्रेशर सिस्टम
यूरोप में गर्मियों के दौरान हाई प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक एक ही जगह बना रहता है। अब होता यह है कि इससे एक तरह से हवा के रास्ते में रुकावट पैदा होती है। इससे बादल और ठंडी हवाएं उस इलाके तक आसानी से नहीं पहुंच पातीं, जबकि आसमान साफ रहने से सूरज लगातार जमीन को गर्म करता रहता है।
अब नतीजा यह होता है कि गर्म हवा एक ही जगह फंसी रहती है और तापमान लगातार बढ़ता जाता है। अगर यह स्थिति कई दिनों तक बनी रहे तो हीटवेव और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। इसी तरह के लंबे समय तक बने रहने वाले मौसम पैटर्न को ब्लॉकिंग पैटर्न कहा जाता है।
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इसे आसान उदाहरण से ऐसे समझें तो जैसे किसी कमरे की खिड़की बंद कर दी जाए और अंदर लगातार हीटर चलता रहे। ऐसे में गर्मी बाहर निकल नहीं पाएगी और कमरा लगातार गर्म होता जाएगा। कमरे के अंदर बैठे लोगों को घुटन होने लगेगी।

यूरोप का आर्कटिक के काफी करीब होना
अब थोड़ा उत्तर की तरफ आर्कटिक की ओर चलते हैं। आर्कटिक दुनिया के सबसे तेजी से गर्म होने वाले क्षेत्रों में से एक है। यहां की बर्फ सिर्फ एक सफेद चादर नहीं है, बल्कि यह सूरज की काफी ऊर्जा को वापस अंतरिक्ष में भेजने का काम भी करती है। लेकिन जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, बर्फ पिघलती है।

बर्फ की जगह जब गहरा समुद्र या जमीन सामने आती है, तो ये सतहें सूरज की ज्यादा ऊर्जा सोखती हैं। इससे तापमान और बढ़ता है, साथ ही बर्फ के पिघलने की रफ्तार भी बढ़ सकती है। इसी प्रोसेस को आर्कटिक एम्प्लीफिकेशन कहा जाता है।
अब सवाल है कि इसका यूरोप से क्या लेना-देना? दरअसल, आर्कटिक यूरोप के काफी करीब है। वहां होने वाले बड़े तापमान और वायुमंडलीय बदलाव हवाओं और मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं। यानी आर्कटिक में हो रहा बदलाव सिर्फ आर्कटिक तक सीमित नहीं रहता।
यूरोप की साफ हवा ने कैसे बढ़ाई गर्मी?
यूरोप ने पिछले कुछ दशकों में वायु प्रदूषण कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे एरोसोल प्रदूषकों में कमी आई है। यह इंसानों की सेहत और पर्यावरण के लिए अच्छी खबर है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है।
हवा में मौजूद कुछ एरोसोल सूरज की रोशनी को बिखेरते और परावर्तित करते हैं। आसान भाषा में समझेंगे तो ये वातावरण में एक तरह की नेचुरल छतरी या फिल्टर की तरह काम कर सकते हैं, जो सूरज की धूप को काफी हद तक जमीन तक पहुंचने से रोकती है।

अब जब ऐसे प्रदूषक कम हुए हैं, तो कुछ क्षेत्रों में धूप सीधे जमीन तक पहुंच सकती है। यानी जिस हवा को साफ करना जरूरी था, उसके साफ होने से कुछ परिस्थितियों में गर्मी बढ़ने का एक अतिरिक्त प्रभाव भी सामने आ सकता है।
गर्म समुद्र ने बढ़ाई यूरोप की तपिश
समुद्र अपने आसपास की हवा को भी गर्म करने लगता है। यह गर्म हवा जब जमीन की ओर पहुंचती है, तो पहले से गर्म जमीन का तापमान और बढ़ जाता है। अब अगर जमीन में नमी भी कम हो और ऊपर हाई प्रेशर सिस्टम बना हो तो गर्मी के बाहर निकलने का रास्ता और मुश्किल हो जाता है। इसकी वजह से गर्मी कई दिनों तक बनी रहती है और हीटवेव ज्यादा चुभने लगती है।

वायुमंडलीय पैटर्न में बदलाव
यूरोप में हवा के बहाव का पैटर्न भी बदल रहा है। जेट स्ट्रीम के रास्ते और रफ्तार में बदलाव की वजह से गर्म हवा कई बार एक ही इलाके में फंस जाती है। ऊपर बना हाई प्रेशर सिस्टम इस गर्मी को बाहर निकलने नहीं देता।
इसे ऐसे समझिए जैसे गर्मी के ऊपर एक ढक्कन लग गया हो। सूरज जमीन को लगातार गर्म करता रहता है, लेकिन गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती। इससे वहां ‘हीट डोम’ जैसी स्थिति बनती है और तापमान कई दिनों तक लगातार बढ़ता रहता है।
