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Graham Staines Case: क्यों टली दारा सिंह की समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया? जानें 1999 के मनोहरपुर तिहरे हत्याकांड की इनसाइड स्‍टोरी

By Santosh Kumar PandeyEdited By: Sanjeev Kumar
Updated: Wed, 27 May 2026 09:14 PM (IST)

ग्राहम स्टेन्स केस के मुख्य दोषी दारा सिंह की समयपूर्व रिहाई पर फैसला टल गया है। ओडिशा राज्य सजा समीक्षा बोर्ड की बैठक सदस्यों की अनुपलब्धता के कारण स्थगित कर दी गई। Odisha Top News

ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स अपनी पत्नी और बच्चों के साथ।

ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स अपनी पत्नी और बच्चों के साथ।

HighLights

  1. दारा सिंह की समयपूर्व रिहाई पर फैसला टला।

  2. ओडिशा सजा समीक्षा बोर्ड की बैठक स्थगित हुई।

  3. ग्राहम स्टेन्स और बेटों की 1999 में हत्या।

संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल (ओडिशा)। देश के सबसे चर्चित और भयावह मामलों में से एक 'Graham Staines Case' के मुख्य दोषी रविंद्र पाल उर्फ दारा सिंह की समयपूर्व रिहाई (सजा माफी) पर फैसला एक बार फिर लटक गया है। ओडिशा राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (SSRB) की मंगलवार को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक सदस्यों की अनुपलब्धता के कारण ऐन वक्त पर स्थगित कर दी गई। 
 
इस स्थगन के बाद गृह विभाग द्वारा जल्द ही नई तारीख घोषित किए जाने की उम्मीद है। बोर्ड की बैठक टलने से दारा सिंह की जेल से रिहाई को लेकर पिछले कई वर्षों से चल रही कानूनी प्रक्रिया में एक बार फिर देरी हो गई है। 
 

मनोहरपुर गांव में जिंदा जला दिए गए थे मिशनरी और उनके दो मासूम बेटे 

दारा सिंह वर्तमान में पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से ओडिशा की जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। 22 जनवरी 1999 की रात को ओडिशा के केंदुझर (क्योंझर) जिले के मनोहरपुर गांव में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे देश सहित अंतरराष्ट्रीय जगत को झकझोर कर रख दिया था। 
 
ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स, जो स्थानीय कुष्ठ रोगियों के बीच सेवा कार्य करते थे, अपने दो मासूम बेटों फिलिप (10 वर्ष) और टिमोथी (6 वर्ष) के साथ एक स्टेशन वैगन (गाड़ी) में सो रहे थे। 
 
इसी दौरान दारा सिंह के नेतृत्व में आई उग्र भीड़ ने वाहन को चारों तरफ से घेर लिया और उसमें आग लगा दी। इस जघन्य कांड में तीनों की जिंदा जलने से दर्दनाक मौत हो गई थी, जिसकी वैश्विक स्तर पर तीखी निंदा हुई थी।
 

फांसी से उम्रकैद तक का सफर 

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के रहने वाले दारा सिंह को घटना के एक साल बाद यानी वर्ष 2000 में गिरफ्तार किया गया था। साल 2003 में भुवनेश्वर की विशेष सीबीआई अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दारा सिंह को मौत की सजा (फांसी) सुनाई थी। 
 
हालांकि, साल 2005 में ओडिशा हाई कोर्ट ने पुनर्विचार के बाद फांसी की सजा को आजीवन कारावास (उम्रकैद) में बदल दिया। इसके बाद जनवरी 2011 में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने भी हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था।
 
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पुलिस हिरासत में दारा सिंह(फाइल फोटो)।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी नहीं हो सकी बैठक

जेल में ढाई दशक बिताने के बाद दारा सिंह ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में समयपूर्व रिहाई की गुहार लगाते हुए एक याचिका दायर की थी। दारा सिंह के वकील ने दलील दी कि उनका मुवक्किल 24 साल से अधिक समय से सलाखों के पीछे है और अपने किए पर गहरा पछतावा जता चुका है। 
 
इस पर संज्ञान लेते हुए 9 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को नोटिस जारी किया था। हाल ही में 13 मई को हुई सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने शीर्ष अदालत को आश्वस्त किया था कि राज्य का सजा समीक्षा बोर्ड 26 मई को बैठक कर दारा सिंह की याचिका पर विचार करेगा। 
 
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई के लिए तय की है, लेकिन बोर्ड की बैठक स्थगित होने से अब सरकार के पास कोर्ट में जवाब देने के लिए बेहद कम समय बचा है।
 

सह-दोषी हो चुका है रिहा, देश में छिड़ी बहस 

इस मामले में दारा सिंह के साथ शामिल रहे सह-दोषी महेंद्र हेमब्रम को जेल में लगभग 25 वर्ष बिताने और अच्छे आचरण के आधार पर पहले ही समयपूर्व रिहा किया जा चुका है। दारा सिंह के वकील एपी सिंह का दावा है कि उनका मुवक्किल भी रिहाई के सभी कानूनी मापदंडों को पूरा करता है। 
 
बचाव पक्ष ने इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की रिहाई का उदाहरण भी कोर्ट के सामने रखा है। हालांकि, दारा सिंह की रिहाई की कोशिशों को लेकर देश के बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच नई बहस छिड़ गई है। 
 
एक पक्ष जहां इसे सुधारात्मक न्याय के तौर पर देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इस घृणा अपराध (हेट क्राइम) की भयावहता का हवाला देते हुए रिहाई का कड़ा विरोध कर रहा है।