Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    हेरा पंचमी की अद्भुत परंपरा: पति श्रीजगन्नाथ के साथ न लौटने पर रूठीं मां महालक्ष्मी, तोड़ा नंदीघोष रथ का हिस्सा

    Updated: Tue, 21 Jul 2026 11:11 AM (IST)

    पुरी में रथयात्रा के दौरान हेरा पंचमी पर मां महालक्ष्मी श्रीगुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ से मिलने पहुंचीं। भगवान के वापस न लौटने पर रुष्ट होकर उन्ह ...और पढ़ें

    हेरा पंचमी की अद्भुत परंपरा

    हेरा पंचमी की अद्भुत परंपरा

    संवाद सूत्र, पुरी। पुरी भगवान श्रीजगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ नौ दिवसीय रथयात्रा के दौरान श्रीगुंडिचा मंदिर के आड़प मंडप में विराजमान हैं। विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा की सबसे अनोखी और भावनात्मक परंपराओं में से एक हेरा पंचमी सोमवार देर रात श्रद्धा और विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। 

    भगवान की इस मानवीय लीला के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। इस अवसर पर श्रीमंदिर और श्रीगुंडिचा मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया।

    महाभिषेक के बाद अस्वस्थ हो गए भगवान

    परंपरा के अनुसार हरण एकादशी के दिन भगवान श्रीजगन्नाथ और मां महालक्ष्मी (श्रीदेवी) का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। विवाह के कुछ ही दिनों बाद भगवान स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों के सुगंधित जल से महाभिषेक के बाद अस्वस्थ हो गए और अनसर गृह में विश्राम एवं उपचार के पश्चात स्वस्थ होकर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को अपने भाई-बहन के साथ श्रीगुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकल पड़े। 

    तब से वे जन्मवेदी (आड़प मंडप) में विराजमान हैं। इधर, नवविवाहिता मां महालक्ष्मी भगवान को वापस श्रीमंदिर लाने के उद्देश्य से सोमवार को पालकी में सवार होकर श्रीगुंडिचा मंदिर पहुंचीं। भगवान ने मां को दर्शन तो दिए, लेकिन उनके साथ श्रीमंदिर लौटने से इनकार कर दिया। 

    WhatsApp Image 2026-07-21 at 10.33.47 AM

    इससे रुष्ट और अभिमानी मांमहालक्ष्मी ने परंपरा के अनुसार भगवान के नंदीघोष रथ के एक हिस्से को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त किया और हेरागोहिरी साही मार्ग से श्रीमंदिर लौट गईं। यह लीला भगवान और मां महालक्ष्मी के दांपत्य प्रेम तथा मान-मनुहार का प्रतीक मानी जाती है।

    खबरें और भी

    मां महालक्ष्मी की विशेष माजन

    परंपरा के तहत श्रीगुंडिचा मंदिर में संध्या आरती के समय श्रीमंदिर में मां महालक्ष्मी की विशेष माजन नीति संपन्न हुई। इसके बाद मां विमला मंदिर पहुंचीं और वहां से अनुमति प्राप्त कर पालकी में श्रीगुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान किया। 

    नंदीघोष रथ के समीप पहुंचने पर पति महापात्र सेवक ने मां का बंदापना, चामर सेवा, घसा बिड़िया और दही-पटी सहित अन्य पारंपरिक सेवाएं अर्पित की। इस दौरान श्रद्धालुओं के हरिबोल और हुलहुली के जयघोष से पूरा शरधाबाली क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में गूंज उठा।

    वापस न लौटने पर मां महालक्ष्मी नाराज

    नीति संपन्न होने के बाद संध्याधूप पूजा के दौरान मां महालक्ष्मी जगमोहन से होते हुए जय-विजय द्वार तक पहुंचीं। वहां पति महापात्र सेवक भगवान श्रीजगन्नाथ की आज्ञामाला लेकर आए और मां को अर्पित की। इसके बाद जय-विजय द्वार का एक कपाट बंद कर टेरा (आवरण) डाल दिया गया। 

    भगवान के साथ वापस न लौटने पर मां महालक्ष्मी पुनः नाराज होकर नाकचणा द्वार से श्रीमंदिर की ओर प्रस्थान कर गईं। इस दौरान भीतरच्छ सेवकों ने उनका बंदापना कर दही-पटी का भोग अर्पित किया। हेरागोहिरी साही मार्ग से श्रीमंदिर लौटते समय विभिन्न स्थानों पर मां को पांति भोग भी समर्पित किया गया।

    हेरा पंचमी की यह परंपरा श्रीजगन्नाथ संस्कृति की अद्वितीय मानवीय लीलाओं में प्रमुख मानी जाती है, जिसमें भगवान और मां महालक्ष्मी के मान, अभिमान और पुनर्मिलन की भावनात्मक झलक देखने को मिलती है।