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    मंगल मुद्दा: झारखंड के कुओं में दफन हो रहा मासूमों का भविष्य, जिम्मेदार कौन?

    Updated: Tue, 14 Jul 2026 04:33 PM (IST)

    झारखंड में घरेलू हिंसा और नशे की लत से हताश माताओं द्वारा बच्चों सहित कुएं में कूदने की दो हृदयविदारक घटनाएं सामने आईं, जिनमें मासूमों की जान चली गई। ...और पढ़ें

    झारखंड में घरेलू हिंसा की भयावहता: माताओं की हताशा और मासूमों का अंत। (सांकेतिक तस्वीर: एआई जेनरेटेड)

    झारखंड में घरेलू हिंसा की भयावहता: माताओं की हताशा और मासूमों का अंत। (सांकेतिक तस्वीर: एआई जेनरेटेड)

    HighLights

    1. पलामू और हजारीबाग में माताओं ने बच्चों संग कुएं में छलांग लगाई।

    2. घरेलू हिंसा, नशाखोरी और हताशा त्रासदी का मुख्य कारण बनी।

    3. समाज, परिवार और व्यवस्था की सामूहिक विफलता उजागर हुई।

    डॉ. चंदन शर्मा, रांची। पलामू के नावाबाजार थाना क्षेत्र के कंडा गांव और हजारीबाग के कटकमसांडी थाना क्षेत्र के होरिया गांव—दो अलग-अलग स्थान, लेकिन लगभग एक जैसी कहानी। पारिवारिक विवाद, पति की नशाखोरी और मारपीट से टूट चुकी मां, और अंत में बच्चों को साथ लेकर कुएं में छलांग लगाने जैसा भयावह कदम।

    पलामू में चार वर्षीय प्रिया और दो वर्षीय डोली की मौत हो गई, जबकि उनकी मां सरिता देवी को ग्रामीणों ने बचा लिया। हजारीबाग में तीन वर्षीय बच्ची और दस माह के दूधमुंहे शिशु की जान चली गई, जबकि उनकी मां चंचला कुमारी बच गईं। इस सप्ताह की दोनों घटनाओं में मां जीवित बच गईं, लेकिन वे मासूम नहीं बच सके, जिन्होंने अभी जीवन को ठीक से देखना भी शुरू नहीं किया था।

    यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले सरायकेला-खरसावां जिले में भी एक मां ने अपने तीन बच्चों के साथ कुएं में छलांग लगा दी थी। उस हादसे में तीनों बच्चों की मौत हो गई थी। ऐसी ही घटना गिरिडीह में हुई, जब दोनों बच्चे भगवान के पास चले गए। झारखंड में घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी, नशे की लत और सामाजिक दबाव बार-बार ऐसी त्रासदियों को जन्म दे रहे हैं।

    जब कोई मां अपने छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर मौत की ओर बढ़ती है, तब केवल एक परिवार नहीं टूटता, बल्कि समाज का भविष्य भी बिखर जाता है। उन मासूमों के भीतर अनगिनत संभावनाएं पल रही थीं।

    शायद कोई बेटी आगे चलकर प्रशासनिक अधिकारी बनती, कोई बेटा वैज्ञानिक, शिक्षक, किसान, चिकित्सक या कलाकार बनकर समाज को नई दिशा देता। लेकिन वे संभावनाएं समय से पहले ही अंधेरे में समा गईं। यह ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई कोई सरकारी आंकड़ा नहीं कर सकता।

    सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि एक मां आखिर इतनी हताश कैसे हो जाती है कि उसे अपनी ममता से बड़ा अपना दर्द दिखाई देने लगता है? यदि कोई महिला इस निष्कर्ष पर पहुंच जाए कि जीने से अधिक आसान मर जाना है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि परिवार, समाज और व्यवस्था—तीनों की साझा विफलता है।

    paalmu ki beti

    (यह ह्रदयविदारक तस्वीर पलामू की दोनों बेटियों की है। ये हम सबसे पूछ रही है सवाल, आखिर क्यों?)

    क्या हमने बच्चों का जीने का अधिकार छीन लिया?

    हम अक्सर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और "देश का भविष्य" जैसे नारों की बात करते हैं। लेकिन इन नारों का अर्थ क्या रह जाता है, जब तीन वर्ष की बच्ची यह भी नहीं समझ पाती कि उसकी मां उसे मौत की ओर क्यों ले जा रही है?

    इन मासूमों ने अभी दुनिया देखी ही कहां थी। उन्होंने तो बस मां के आंचल की गर्मी महसूस की थी। उनके जीवन का अधिकार किसी से भी नहीं छीना जा सकता—न उस पति से, जो नशे और हिंसा में डूबा है; न उस समाज से, जो सब कुछ देखकर भी चुप रहता है; और न उस व्यवस्था से, जो समय पर सहायता नहीं पहुंचा पाती।

    समाज और व्यवस्था की साझा विफलता

    इसे केवल एक पारिवारिक त्रासदी मानकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन सच इससे कहीं अधिक गंभीर है। जब पड़ोस में हो रही मारपीट को घर का मामला कहकर अनदेखा किया जाता है, जब किसी महिला की चीख सुनकर भी लोग चुप रहते हैं, तब हम अनजाने में अगली त्रासदी की जमीन तैयार कर रहे होते हैं।

    घरेलू हिंसा केवल पति-पत्नी का निजी विवाद नहीं है। उसका सबसे बड़ा असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिनका बचपन भय, असुरक्षा और हिंसा के बीच बीतता है। कई बार वे उसी हिंसा का शिकार बन जाते हैं, जबकि उनका कोई दोष नहीं होता।

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    संवेदनशील समाज की जरूरत

    हमें अपनी संवेदनाओं को जीवित रखना होगा। हर बच्चे का अधिकार है कि उसे सुरक्षित घर, सुरक्षित बचपन और सम्मानपूर्ण जीवन मिले। हर मां का अधिकार है कि वह भय और हिंसा से मुक्त वातावरण में अपने बच्चों का पालन-पोषण कर सके।

    हिंसा झेल रही महिलाओं की मदद केवल इसलिए जरूरी नहीं कि वे महिलाएं हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे जीवन की संरक्षक हैं। मां सुरक्षित होगी, तभी बच्चे सुरक्षित होंगे और तभी समाज का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

    सरकार और प्रशासन क्या करें?

    • हर थाने में घरेलू हिंसा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विशेष प्रकोष्ठ सक्रिय किए जाएं तथा प्राथमिकी दर्ज करने और पीड़ित महिलाओं को तत्काल सुरक्षा देने की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
    • गांव-गांव तक वन स्टॉप सेंटर, महिला सहायता हेल्पलाइन (181) और महिला सहायता कक्ष की प्रभावी पहुंच बनाई जाए।
    • आंगनबाड़ी सेविकाओं, सहिया और आशा कार्यकर्ताओं को मानसिक तनाव और घरेलू हिंसा की प्रारंभिक पहचान तथा समय पर सहायता उपलब्ध कराने का प्रशिक्षण दिया जाए।
    • स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करते हुए महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण, कौशल विकास और बेटियों के लिए प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार किया जाए।
    • नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।
    • पिछले वर्षों की ऐसी घटनाओं का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार कर अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी और हस्तक्षेप किया जाए।

    समाज क्या कर सकता है?

    • पड़ोसी, रिश्तेदार और स्थानीय लोग घरेलू हिंसा को "घर का मामला" मानकर चुप न रहें। जरूरत पड़ने पर पुलिस या संबंधित सहायता सेवाओं को सूचना दें।
    • पंचायतों, विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से लैंगिक समानता और घरेलू हिंसा के प्रति जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
    • पुरुषों को भी इस बदलाव का सहभागी बनना होगा। नशे से दूरी, महिलाओं के प्रति सम्मान और संवाद की संस्कृति को परिवार का हिस्सा बनाना होगा।
    • मीडिया को ऐसी घटनाओं का संवेदनशील ढंग से प्रस्तुतिकरण करना चाहिए। सनसनी फैलाने के बजाय सहायता सेवाओं और समाधान की जानकारी भी लोगों तक पहुंचानी चाहिए।
    • हर व्यक्ति अपने आसपास की महिलाओं और बच्चों की स्थिति के प्रति सजग रहे। कई बार एक संवाद, एक सूचना या समय पर किया गया हस्तक्षेप किसी की जान बचा सकता है।


    प्रिया, डोली और ऐसे अनगिनत मासूम अब केवल आंकड़े नहीं हैं। वे हमसे पूछ रहे हैं कि आखिर उनका अपराध क्या था? इस प्रश्न का उत्तर सरकार, समाज और परिवार—सभी को मिलकर देना होगा।

    कानूनों और योजनाओं को कागजों से निकालकर गांव-गांव तक पहुंचाना होगा। समाज को सहानुभूति से आगे बढ़कर सक्रिय सहयोग की संस्कृति विकसित करनी होगी। परिवारों को यह समझना होगा कि किसी भी विवाद का समाधान हिंसा, नशा या निराशा नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और समय पर सहायता है।

    यदि हम आज भी नहीं चेते, तो किसी और गांव के किसी और कुएं से फिर किसी मासूम के जीवन के बुझ जाने की खबर आएगी। इसलिए यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि चुप्पी तोड़ने, जिम्मेदारी निभाने और बदलाव का संकल्प लेने का है।

    क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों या विकास के आंकड़ों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे मासूम नागरिकों की कितनी सुरक्षा कर पाता है।