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माननीय! मैं भाषा हूं, कृपया मुझे बचा लीजिए

By Navneet SharmaEdited By: Prince Sharma
Published: Thu, 13 Aug 2026 08:31 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भाषा के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त की गई है, जिसमें नेताओं के बीच अपमानजनक टिप्पणियों और वाकयुद्ध के कई उदाहरण दिए गए हैं।

बायें से सीएम सुखविन्द्र सिंह सुक्खू और विधायक सुधीर शर्मा। जागरण आर्काइव

बायें से सीएम सुखविन्द्र सिंह सुक्खू और विधायक सुधीर शर्मा। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. हिमाचल की राजनीति में अपमानजनक भाषा का बढ़ता प्रयोग चिंताजनक

  2. पूर्व नेताओं ने गुस्से में भी भाषा की मर्यादा बनाए रखी

  3. जनप्रतिनिधियों को सार्वजनिक संवाद में भाषा संहिता का पालन करना चाहिए

नवनीत शर्मा, राज्य संपादक। कल्पना कीजिए कि यदि मनुष्य जैसी कृति का सृजन करते हुए ईश्वर के मन में यह भाव आता कि जो उसके मन में चल रहा है, वह माथे पर शब्दों के रूप में दिखाई दे जाए तो कितनी संकटप्रद स्थिति हो जाती। व्यक्ति मुस्करा रहा है लेकिन माथे पर अपशब्द ‘डिस्प्ले’ हो रहे हैं! लेकिन ऐसी व्यवस्था हुई कि जीभ दी गई और भाषा संस्कार दिया गया।

भाषा को भाव के अनुरूप चुनने के लिए यानी शब्दों के प्रबंधन के लिए मन-मस्तिष्क दिए गए। लेकिन डिस्प्ले का युग है इसलिए हिमाचल प्रदेश के कतिपय राजनीतिक लोग भीतर की भड़ास को दिखाने में कोई संकोच नहीं बरत रहे हैं।

आसिम वास्ती ने बेशक कहा है : मेरी जबान के मौसम बदलते रहते हैं/ मैं आदमी हूं मेरा एतबार मत करना। पर आदमी होना तो भाषा से जुड़े होने की पहली शर्त है। मौसम बदल भी जाए, गालियां कैसे दे देंगे आप? हिमाचल प्रदेश में जब 2025 वाली आपदा आई थी, तो सराज में आपदा भाषा पर भी आई थी जब राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के बीच ऐसा वाकयुद्ध छिड़ा था, जो अनुचित था।

उसके बाद इंटरनेट मीडिया पर एक-दूसरे के विरुद्ध कई राजनेता लगे रहे। अपमानजनक भाषा की कढ़ी में उबाल तब आया जब धर्मशाला से भाजपा विधायक सुधीर शर्मा ने मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के लिए कहा कि मुख्यमंत्री जी ने चंबा में बहुत सादा हज्जाम से बाल कटवाए और अपना फोटो वायरल किया। लेकिन साथ ही चंबा चप्पल का जिक्र भी किया।

इस पर सुधीर शर्मा के पुतले फूंके गए और कुछ एफआइआर भी दर्ज हुईं। उनके कहे पर इतनी प्रतिक्रिया आई कि बात घोड़ा और खच्चरपालक तक पहुंच गई। इस प्रदेश ने वीरभद्र सिंह बनाम प्रेम कुमार धूमल, वीरभद्र सिंह बनाम विद्या स्टोक्स वाकयुद्ध देखे हैं, प्रेम कुमार धूमल बनाम शांता कुमार वाकयुद्ध देखे हैं लेकिन यह नौबत कभी नहीं आई कि दूसरे के प्रति अपने मन की हसरत (वहशत) को इस प्रकार व्यक्त किया गया हो।

एक बार वीरभद्र सिंह नेता प्रतिपक्ष थे तो उनसे यह पूछने का संयोग हुआ कि आप पर धूमल साहब ने कई आरोप लगाए हैं उनके बारे में क्या कहेंगे। इस पर वीरभद्र सिंह के चेहरे पर क्रोध के भाव आए लेकिन उन्होंने अपनी अदा के मुताबिक, हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘ देखिए.. यह जो...श्री प्रेम कुमार धूमल हैं.... वह झूठ की यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं।’

गुस्सा बहुत था, लेकिन धूमल जी के नाम से पहले श्री लगाना नहीं भूले।‘ एक बार पूछा गया कि तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष विद्या स्टोक्स की रैलियों को आपने रैलू कहा है? इस पर भी उनका चेहरा तमतमा गया और वह बोले, ‘यह झूठ है...यह मेरा भाषा संस्कार नहीं।’

2019 में कांग्रेस में कुछ जिला अध्यक्ष बनाए तो वीरभद्र सिंह ने भावावेश में कहा कि पता नहीं क्या-क्या कूड़ा कबाड़ भर लिया है। इस पर सुक्खू की प्रतिक्रिया केवल यह थी कि ऐसा कह कर वीरभद्र सिंह ने कार्यकर्ताओं का अपमान किया है।

हालांकि उसी दौर में टौंडा और मकरझंडू विमर्श भी निकले थे... बहुत हुआ तो बंदर का संदर्भगत जिक्र था। टौंडा का अर्थ था शरारतें करने वाला और मकरझंडू का यह अर्थ खुला था कि यह बुरी नजर से बचाने के लिए घर पर टांगा जाने वाला प्रतीक है।

जगत सिंह नेगी ने तो सराज आपदा के बाद कहा था कि कंगना रनौत इसलिए आपदाग्रस्त लोगों का हाल पूछने नहीं आईं क्योंकि उनका मेकअप धुल जाता और असली चेहरा सामने आ जाता।

हालांकि, कंगना भी बोल कर सोचती हैं, सोच कर नहीं बोलतीं लेकिन इससे औरों को उन पर लैंगिक टिप्पणियां करने का अधिकार तो नहीं मिल जाता। हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक लोगों के सामने देश के संदर्भ हैं, देश के आदर्श उदाहरण हैं। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को सुषमा स्वराज ने कभी अपशब्द नहीं बोले लेकिन राजनीतिक प्रहारों में कमी भी नहीं रखी।

कुछ वर्षों से देश में नई शिक्षा संहिता की बहुत चर्चा है। प्रदेश में भी अध्यापकों की कार्यशालाओं में यह बताया जाता है कि विद्यार्थियों का मनोबल न तोड़ें, उनसे आप कह कर बात करें, डंडा-छड़ी तो भूल ही जाएं।

क्या राजनीतिकों के लिए भाषा-बोली की संहिता नहीं होनी चाहिए? शैक्षणिक योग्यता से तो समझौता हो ही चुका है लेकिन जिन्हें माननीय, आदरणीय, लोकप्रिय सुनने की आदत है, उन्हें वसीम बरेलवी के शब्दों में यह हुनर कौन सिखाएगा कि कौन सी बात कहां, कैसे कही जाती है /ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है। जनप्रतिनिधि, इधर के हों या उधर के, उन्हें भाषा की मर्यादा का ध्यान रखना ही होगा।

विधानसभा में उन्हें देखने विद्यार्थी भी जाते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ निजी स्तर पर उतर कर गालियों का आदान-प्रदान करना नहीं है। हिमाचल के सामने अपने पैरों पर खड़ा होने की चुनौती है, अपने पर्यटन को सार्थक बनाने की चुनौती है..। बदजुबानी न इस प्रदेश की प्राथमिकता है और न होनी चाहिए। इससे केवल खानवादे बोलते हैं: कहूं मैं आप और तुम तू पे उतरो/ यहीं तो खानवादा बोलता है।

(लेखक दैनिक जागरण, हिमाचल प्रदेश के संपादक हैं)

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