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    अब उम्र नहीं, तैयारी मायने रखती है… खेल की दुनिया में 'टीनएज टैलेंट' क्यों मचा रहा धमाल?

    Updated: Mon, 23 Mar 2026 04:48 PM (IST)

    खेल जगत में कम उम्र के खिलाड़ियों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है, जिन्हें 'वंडरकिड्स' कहा जा रहा है। क्रिकेट में वैभव सूर्यवंशी, फुटबॉल में मैक्स डॉवमैन ...और पढ़ें

    खेल जगत में 'वंडरकिड्स' का दौर

    खेल जगत में 'वंडरकिड्स' का दौर

    स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। खेल की दुनिया में कम उम्र के खिलाड़ियों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। क्रिकेट की बात करें तो 14 साल के वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Suryavanshi) का आईपीएल और अंडर-19 स्तर पर शतक जमाना इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है। अब किशोर खिलाड़ी सिर्फ टीम का हिस्सा नहीं, बल्कि मैच का रुख तय करने वाले बन रहे हैं। 

    वहीं, इंग्लिश फुटबॉल क्लब की बात करें तो आर्सनल के मैक्स डॉवमैन हाल ही में प्रीमियर लीग के इतिहास में गोल करने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बने हैं।

    स्केटबोर्डिंग में 17 साल के स्काई ब्राउन और डाट्स में 8 साल के ल्यूक लिटलर दो-दो बार विश्व चैंपियन बन चुके हैं। टेनिस में एमा राडुकानू ने 18 की उम्र में ग्रैंड स्लैम जीता था। फॉर्मूला-1 में 19 साल किमी एंटोनेली दूसरे सबसे कम उम्र के रेस विनर बने हुए हैं। ऐसा लगता है टीनेजर्स खेलों पर राज कर रहे हैं। 

    खेल जगत में 'वंडरकिड्स' का दौर

    दरअसल, इस ट्रेंड के केंद्र में 14 से 18 साल के युवा खिलाड़ी हैं, जिन्हें अब शुरुआती उम्र में ही प्रोफेशनल एक्सपोजर मिल रहा है। ये खिलाड़ी अकादमी सिस्टम, नेशनल कैंप्स और फ्रेंचाइजी क्रिकेट के जरिए तेजी से उभर रहे हैं। पिछले एक दशक में ये बदलाव ज्यादा स्पष्ट हुआ है, लेकिन हाल के सालों में इसकी रफ्तार और तेज हो गई है।

    खासकर टी20 क्रिकेट के उभार के बाद युवाओं को जल्दी मौके मिलने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण आधुनिक स्पोर्ट्स साइंस, मनोविज्ञान और एडवांस ट्रेनिंग है। फॉर्मूला-1 की ड्राइवर एकेडमी में नेक्स्ट-जेनरेशनल सिमुलेटर और ट्रेनिंग की मदद से युवाओं को कम अनुभव के बावजूद कम उम्र में ही शारीरिक और मानसिक दबाव के लिए तैयार किया जाता है।  

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    ये ट्रेंड भारत तक ही सीमित नहीं

    ये ट्रेंड सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, लेकिन भारत में आईपीएल जैसे बड़े मंच ने इसे नई ऊंचाई दी है। यहां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवा खिलाड़ियों को सीधे बड़े मुकाबलों में उतारा जा रहा है। अब खिलाड़ी सिर्फ टैलेंट के भरोसे नहीं, बल्कि पूरी वैज्ञानिक तैयारी के साथ मैदान में उतरते हैं।

    फुटबॉल में भी एलीट प्लेयर परफॉर्मेंस प्लान जैसी व्यवस्थाओं ने बड़ी क्रांति ला दी है। डेस रयान कहते हैं कि अब खिलाड़ियों को फिजिकल, मेडिकल, साइकोलॉजिकल और एजुकेशनल तौर पर जो सुविधाएं मिल रही हैं, वे उन्हें बड़े मंच के लिए जल्दी तैयार कर रही हैं।

    प्रोफेसर शॉन कमिंग बताते हैं कि अब खेल पहले से कहीं ज्यादा तेज और ताकतवर हो गया है। जो बच्चे जल्दी विकसित होते हैं, उन्हें बेहतर सपोर्ट मिलता है। एकेडमी में बच्चों पर भारी वजन उठाने का दवाब नहीं जाला जाता, बल्कि उन्हें सही टेक्निक सिखाई जाती है ताकि शरीर तैयार होने पर वे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें।

    हालांकि, कामयाबी के साथ कुछ सावधानियां बर्तनी पड़ती हैं। कुछ एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि उन युवा एथलीटों का शरीर 22 साल की उम्र तक बढ़ता है, इसलिए चोटों से बचाने के लिए वर्कलोड मैनेज करना जरूरी है। 

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