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    50 करोड़ के ग्लोबल चेस मार्केट का किंग बना अमृतसर, 40 देशों में है धाक; कीमत 500 से 5 लाख तक

    Updated: Sun, 19 Jul 2026 06:48 PM (GMT+05:30)

    अमृतसर दुनिया के शतरंज उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है, जहां विशेष रूप से 'घोड़े' की बारीक नक्काशी रामगढ़िया कारीगरों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी की जाती है। ...और पढ़ें

    'घोड़े' की बेमिसाल कारीगरी के दम पर दुनिया में कायम है अमृतसर की बादशाहत।

    'घोड़े' की बेमिसाल कारीगरी के दम पर दुनिया में कायम है अमृतसर की बादशाहत।

    HighLights

    1. अमृतसर विश्व शतरंज उद्योग का प्रमुख केंद्र है

    2. 'घोड़े' की बारीक नक्काशी में रामगढ़िया कारीगर माहिर

    3. 50 करोड़ से अधिक के शतरंज सेट 40 देशों में निर्यात

    सतीश शर्मा, अमृतसर। गुरु नगरी अमृतसर केवल धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के शतरंज उद्योग का भी एक बड़ा केंद्र है। सिंगापुर में डेढ़ साल पहले विश्व शतरंज चैंपियन डी. गुकेश ने जिस शतरंज सेट पर फाइनल खेलकर यह उपलब्धि हासिल की थी, वह अमृतसर में ही तैयार किया गया था।

    खास बात है कि अमृतसर की पहचान केवल शतरंज बनाने से नहीं, बल्कि उसके सबसे कठिन और कलात्मक मोहरे 'घोड़े' की बारीक नक्काशी से बनी है। इस कला को आज भी मुख्य रूप से रामगढ़िया समुदाय के कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोए हुए हैं। अमृतसर में ऐसे लगभग 25 विशेषज्ञ कारीगर हैं, जो घोड़े की नक्काशी में महारत रखते हैं।

    शतरंज के 32 मोहरों में घोड़े को सबसे जटिल माना जाता है। उसकी आंखें, कान, चेहरे के भाव और शरीर की बनावट पूरी तरह हाथ से तराशी जाती है। एक बेहतरीन घोड़ा तैयार करने में वर्षों का अनुभव लगता है और हर कारीगर यह काम नहीं कर सकता। यही वजह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शतरंज बनने के बावजूद वहां के निर्माता भी अपने प्रीमियम सेट पूरे करने के लिए घोड़े का जोड़ा अमृतसर से मंगवाते हैं।

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    झब्बाल रोड स्थित फैक्ट्री के संचालक ऋषि शर्मा बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़ा है। वर्ष 1940-50 के दशक में शतरंज के मोहरे हाथी दांत से बनाए जाते थे, लेकिन प्रतिबंध के बाद उद्योग पूरी तरह लकड़ी पर आ गया। शुरुआती दौर में दिल्ली और मुंबई के व्यापारी अमृतसर की शतरंज विदेश तक पहुंचाते थे।

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    वर्ष 1995 के बाद स्थानीय उद्योगपतियों ने सीधे निर्यात शुरू किया और आज अमृतसर हर साल करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक के हस्तनिर्मित शतरंज सेट विदेश भेजे जा रहे हैं। यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, आस्ट्रेलिया सहित 40 से अधिक देशों में अमृतसर के शतरंज सेट पहुंचते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल होने वाले कई उच्च गुणवत्ता वाले शतरंज सेट भी यहीं तैयार किए जाते हैं। जर्मनी इसका सबसे बड़ा बाजार है।

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    आज एंटीक डिजाइन वाले शतरंज सेट की करीब 40 प्रतिशत मांग है, जबकि स्टान्टन शैली अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की पहली पसंद बनी हुई है। देश के भीतर तमिलनाडु, बेंगलुरु, कोच्चि, जयपुर, जोधपुर और मैसूर जैसे शहरों में इसकी अच्छी बिक्री होती है। सुरक्षा बलों के जवानों में भी अमृतसर में तैयार शतरंज सेट विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

    तीसरी-चौथी पीढ़ी संभाल रही है विरासत

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    अमृतसर का शतरंज उद्योग केवल कारोबार नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत है। यहां कई परिवार तीसरी और चौथी पीढ़ी तक इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं। बच्चे बचपन से ही लकड़ी की पहचान, मोहरों की तराशी और नक्काशी सीखने लगते हैं। आधुनिक मशीनों के दौर में भी यहां प्रीमियम शतरंज सेट का अधिकांश काम हाथों से किया जाता है, जिससे प्रत्येक सेट अपनी अलग पहचान बनाए रखता है।

    देशभर की लकड़ी पर अमृतसर की कला

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    प्रीमियम शतरंज तैयार करने के लिए बाक्सवुड, एबोनी (आबनूस), रोजवुड, पडुक और शीशम जैसी उत्कृष्ट लकड़ियां बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से मंगाई जाती हैं। लकड़ी को कई महीनों तक प्राकृतिक तरीके से सुखाने के बाद पारंपरिक मशीनों और हाथ के औजारों से प्रत्येक मोहरे को आकार दिया जाता है।

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    अंतिम चरण में कई बार पालिश की जाती है, ताकि उसकी चमक और मजबूती वर्षों तक बनी रहे। शहर की करीब 30 इकाइयों में शतरंज का निर्माण होता है, जिनमें चार-पांच बड़े और शेष मध्यम स्तर के उद्योग हैं। यहां पांच इंच से 24 इंच तक के चेस बोर्ड और डेढ़ इंच से छह इंच तक के चेस पीस तैयार किए जाते हैं। साधारण शतरंज सेट 500 रुपये से शुरू होकर पांच लाख रुपये तक बिकते हैं।