700 रुपये की जमीन पर कैसे बना सिखों का पवित्र स्थल, पढ़ें गोल्डन टेंपल के बनने की कहानी
हरमंदिर साहिब (गोल्डन टेंपल) का इतिहास साढ़े चार सौ साल पुराना है। सिखों के तीसरे गुरु श्री गुरु अमर दास जी ने इस स्थल की नींव रखी थी। बाद में चौथे गु ...और पढ़ें

कैप्शन: हरमंदिर साहिब के बनने की कहानी (जागरण ग्राफिक्स)

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प्रिंस शर्मा, अमृतसर। सिख धर्म की नींव और उसके पवित्र केंद्रों की स्थापना एक ऐसी कहानी है, जहां त्याग, सेवा और मानवता का संगम दिखाई देता है। यह यात्रा शुरू होती है बाबा नानक के चरणों से और धीरे-धीरे एक ऐसे मार्ग की रचना करती है जो आज करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।
सिखों के पहले गुरु श्री नानक देव जी ने करतारपुर (पाकिस्तान) को अपना निवास स्थल बनाया। वहीं, दूसरे गुरु श्री अंगद देव जी ने पंजाब के तरनतारन में खडूर साहिब में अपना निवास स्थल बनाया। तीसरे गुरु श्री गुरु अमर दास जी का प्रमुख निवास स्थान और कार्यक्षेत्र पंजाब के ब्यास नदी के किनारे स्थित गोइंदवाल साहिब था, यह जगह- तरनतारन जिले में ब्यास नदी के तट पर मौजूद है और यहीं से शुरू होता है सिखों के पवित्र स्थान हरमंदिर साहिब के बनने के कहानी।
पंजाब के अमृतसर में मौजूद गोल्डन टेंपल (श्री हरमंदिर साहिब) न सिर्फ सिखों का एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आपसी एकता, मानवता और आस्था का भी केंद्र है। इसके बनने की कहानी भी एकता और समरसता का वर्णन करती है। आइए इसी क्रम में पवित्र स्थल की इतिहास की यात्रा पर चलते हैं।

गुरु अमरदास ने चुनी थी यह जगह
सिखों के तीसरे गुरु श्री अमरदास जी ने ध्यान और प्रार्थना के लिए तरनतारन जिले के गोइंदवाल को अपना निवास स्थल चुना। गुरु अमरदास के अवसान के बाद श्री रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने। वह इस बात को लेकर आश्वासित थे कि यह भविष्य में सिखों का धार्मिक और पवित्र स्थल बनेगा। इसलिए उन्होंने 700 रुपये में सरोवर और इसके आसपास की जमीन को खरीद लिया और आज यह वही स्थान है जहां हरमंदिर साहिब बनाया गया है।
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गुरु अर्जन देव ने शुरू कराया निर्माण
उन्होंने यहां श्री दरबार साहिब का निर्माण कार्य भी शुरू किया। पहली बार 16 अगस्त, 1604 को श्री दरबार साहिब में स्थापित किया गया। हालांकि, गुरु अर्जन देव जी का दौर 25 वर्षों तक ही रहा। इस बीच उन्होंने इसकी सतह को पक्का करवाया और स्नान के लिए सरोवर के चारों ओर सीढ़ियां बनवाई। सरोवर में स्नान की प्रथा गुरु अर्जन देव के दौर में ही शुरू हुई।

अन्य मंदिरों से क्यों अलग है गोल्डन टेंपल?
श्री हरमंदिर साहिब अन्य मंदिरों से काफी अलग है। पवित्र स्थल को एक सामान्य चबूतरे पर बनाया गया है। लेखक खुशवंत सिंह किताब 'द हिस्ट्री ऑफ द सिख' में लिखते हैं, 'जहां अन्य मंदिरों को ऊंचे चबूतरे पर बनाया जाता था। वहीं, श्री हरमंदिर साहिब को नीचे बनाया गया। यह इसलिए ताकि श्रद्धालुओं को प्रवेश के लिए नीचे उतर कर जाना पड़े। वहीं, हरमंदिर साहब में चार प्रवेश द्वार बनाए गए।
इस पवित्र तीर्थस्थल के चारों दिशाओं से खुलने वाले प्रवेश द्वार यह दर्शाते हैं कि समाज के हर वर्ग के लोगों का यहां समान रूप से स्वागत है। आसपास की भूमि से नीचे निर्मित यह गुरुद्वारा समता और विनम्रता का पाठ पढ़ाता है।। वहीं, इसकी वास्तुकला हिंदू और मुस्लिम शैली का मिश्रण है।
श्री हरमंदिर साहिब के निर्माण के लिए गुरु अर्जुन देव को धन की आवश्यकता थी। उन्होंने सिखों से आह्वान किया कि अपनी कुल आमदनी का दसवां हिस्सा मंदिर निर्माण के लिए दें। इस धन से न केवल मंदिर का निर्माण हुआ बल्कि कई कल्याणकारी परियोजनाएं भी शुरू हुईं। जब मंदिर का निर्माण पूरा हुआ तो इस स्थान को अमृतसर का नाम दिया गया।
- अमृतसर नाम का मतलब: श्री हरमंदिर साहिब को शुरुआत में गुरु का चक व रामदासपुर नामों से जाना जाता था। निर्माण पूरा होने के बाद इस स्थान को अमृतसर नाम दिया गया। अमृतसर दो शब्दों से मिलकर बना है। अमृत का अर्थ- अमृत से और सर का अभिप्राय सरोवर।

गुरु गोविंद सिंह का योगदान
सन् 1604 में गुरु अर्जन देव ने मंदिर में गुरु ग्रंथ साहिब को स्थापित किया। इसे अंतिम स्वरूप सिखों के अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने दिया। उन्होंने मृत्य से पहले वर्ष 1708 में अपने अनुयायियों से कहा कि वे गुरु ग्रंथ साहिब को अपने सबसे बड़े गुरु के रूप में देखें। इस तरह सन् 1709 में गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया गया।
इस दौरान अमृतसर एक स्वायत्त नगर के रूप में काम करने लगा
जहांगीर ने गुरु अर्जन देव को दिया मृत्युदंड का आदेश
सन् 1606 में गुरु अर्जन देव को जहांगीर के आदेश पर मृत्युदंड दे दिया गया। 30 मई, 1606 को उन्हें लाहौर में मृत्युदंड दिया गया। मुगल सम्राट जहांगीर के आदेश पर उन्हें अत्याचारपूर्ण यातनाएं दी गईं, जिसके बाद उन्होंने रावी नदी के तट पर अपने प्राण त्याग दिए। उन्हें 'शहीदों के सरताज' के रूप में जाना जाता है।
अर्जन देव ने जहांगीर के बेटे को आशीर्वाद दिया था और सिर पर मुकुट रखा था। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि जहांगीर ने अर्जन देव की लोकप्रियता को देखते हुए यह कदम उठाया था।

कैप्शन: फोटो एआई की सहायता से बनाई गई है
अहमद शाह अब्दाली और अमृतसर
सन् 1757 में अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने हरमंदिर साहिब पर हमला किया। इस दौरान जब हिंदुस्तान में नरसंहार कर वह वापस लौट रहा था, तब सिखों ने अमृतसर में उसकी सेना का सामना किया और दो हजार महिलाओं को अहमद शाह के चंगुल से छुड़वाया।
सन् 1764 में सातवीं वार सिंधू नदी पार की। इस बीच भी उसे सिखों का सामना करना पड़ा। इस बीच अफगानी सेना ने अमृतसर पर हमला किया। उस समय केवल 20 सिख हरमंदिर साहिब की रक्षा कर रहे थे, जिन्होंने बहादुरी से अफगानी सेना का मुकाबला किया। लेकिन वह ज्यादा समय तक टिक नहीं सके। अफगानियों ने उन सिखों की हत्या कर उनके शव पवित्र सरोवर में फेंक दिए।

कैप्शन: फोटो एआई द्वारा बनाई गई है
कुछ सिखों ने अपमान का बदला लेने के लिए एक टोली बनाई जिसका नेतृत्व- बाबा दीप सिंह ने किया। उन्होंने अफगानियों का जमकर मुकाबला किया और जब तक उन्होंने खुद के प्राण नहीं गंवा दिए वह लड़ते रहे। अंत में बाबा दीप सिंह ने भी अपने प्राण त्याग दिए। आज भी दरबार साहिब में तीर्थयात्री उक्त स्थान पर जाकर श्रद्धांजलि देते हैं।
और फिर बना गोल्डन टेंपल...
सन् 1759 में दरबार साहिब के पुननिर्माण के लिए फिर चंदा इकट्ठा किया गया और दरबार साहिब की मरम्मत करवाई गई। सन् 1802 में महाराजा रणजीत सिंह ने हरमंदिर साहिब में आकर मत्था टेका और प्रण लिया वह संगमरमर और सोने से इसका पुननिर्माण करवाएंगे। उन्होंने मंदिर के ऊपरी हिस्से को तांबे और शुद्ध सोने की परतों से ढका। जिसके बाद हरमंदिर साहिब का स्वर्ण मंदिर या गोल्डन टेंपल भी कहा जाने लगा।
ऑपरेशन ब्लू स्टार और हरमंदिर साहिब

कैप्शन: फोटो एआई द्वारा बनाई गई है।
सन् 1984 में जरनैल सिंह भिंडरांवाले के अंत के लिए इंदिरा गांधी सरकार हरमंदिर साहिब के अंदर सेना को भेजा। इस अभियान को ऑपरेशन सिंदूर कहा गया। इसमें सैकड़ों जिंदगियां गईं। वहीं, गोल्डन टेंपल में सिखों के पवित्र स्थल अकाल तख्त को भी क्षति पहुंची। जिससे सिख काफी आक्रोशित हुए। नतीजतन 31 अक्टूबर, 1984 को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री की उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई।
लाखों श्रद्धालु मत्था टेकते हैं

वर्तमान में गोल्डन टेंपल में रोजाना डेढ़ लाख से भी ज्यादा श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं। श्री हरमंदिर साहिब में मौजूद गुरु रामदास लंगर हॉल में अखंड लंगर की परंपरा भी है। यहां चूल्हा कभी ठंडा नहीं पड़ता। यहां 24 घंटे, सातों दिन बिना किसी भेदभाव के सेवा होती है।
एक साथ यहां 100 लोग लंगर करते हैं। खास बात है कि यह दुनिया के सबसे बड़े सामुदायिक रसोइयों में से एक बना हुआ है। यहां दिन हो या रात हर समय यहां श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहता है। लंगर में हाथ बंटाने के लिए सैकड़ों स्वयंसेवी तैयार रहते हैं। 500 स्वयंसेवी यहां एक साथ सेवा करते हैं।