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रणनीति में एबीवीपी रही भारी, कलह में उलझी एनएसयूआई; PU छात्र संघ चुनाव के नतीजों ने चौंकाया

Published: Wed, 02 Sep 2026 07:20 AM (IST)

पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने अपनी चाणक्य रणनीति से जीत हासिल की, जबकि एनएसयूआई आंतरिक कलह के ...और पढ़ें

पीयू में सोमवार को एबीवीपी की जीत के बाद जश्न का माहौल। फोटो: उपेंद्र सेन गुप्ता

पीयू में सोमवार को एबीवीपी की जीत के बाद जश्न का माहौल। फोटो: उपेंद्र सेन गुप्ता

HighLights

  1. एबीवीपी ने शिअद छात्र संगठन सोई के समर्थन से जीत दर्ज की।

  2. एनएसयूआई आंतरिक गुटबाजी और पुराने चेहरों की दूरी से हारी।

  3. आप की एएसएपी बड़े नेताओं के समर्थन के बावजूद सफल नहीं हुई।

रणनीति में एबीवीपी रही भारी, कलह में उलझी एनएसयूआइ
पीयू छात्रसंघ चुनाव :
- दिग्गजों का साथ होने के बावजूद दम नहीं दिखा पाई एएसएपी
- अध्यक्ष पद के लिए पहली बार मैदान में उतरी सथ को नहीं मिला स्टूडेंट का साथ
- हरियाणा के दिग्गजों के हाथ में कमान के बावजूद एनएसयूआइ की हार पर रणनीति पर सवाल

मोहित पांडेय, चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव को पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा था, क्योंकि हरेक चुनाव में करीब पांच लाख युवा मतदाता होते हैं, जोकि किसी भी पार्टी की तकदीर को बना सकता है।

इस बार का पीयू के चुनावी दंगल में असल मायनों में छात्र संगठनों नहीं बल्कि सियासी पार्टियों का रहा। जिसमें भाजपा के एबीवीपी की चाणक्य रणनीति जीत की सूत्रधार बनी, तो कांग्रेस की एनएसयूआई को लगातार तीसरे चुनाव में आपसी कलह से हार का सामना करना पड़ा।

वहीं, आप की एएसएपी धुरंधरों के पुरजोर समर्थन के बाद भी अपनी नैया पार लगाने में नाकाम रही। वहीं, पहली बार चुनाव लड़ने वाली पंथक संगठन सथ को स्टूडेंट्स का साथ नहीं मिला।

कई फैक्टर ने किया काम

एबीवीपी की जीत में बहुत सारे फैक्टर रहे। चुनाव से एक दिन पहले शिअद का छात्र संगठन सोई के साथ एबीवीपी का समर्थन करना कारगर रणनीति साबित हुआ।

इसके साथ ही दो साल पहले पीयू छात्र संघ का चुनाव जीतने वाले निर्दलीय उम्मीदवार अनुराग दलाल और बीते वर्ष आम आदमी पार्टी की स्टूडेंट विंग एएसएपी से अध्यक्ष पद का टिकट के चाह्वान चिराग को भी एबीवीपी में शामिल कर लिया गया था।

वहीं, एनएसयूआई दो वर्षों की तरह इस बार भी आपसी कलह के कारण बिखर गई। अध्यक्ष पद के उम्मीदवार को लेकर एक ओर से एनएसयूआइ में जहां सब एकमत दिखाई दिए।

वहीं, उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार को लेकर संगठन में गुटबाजी देखने को मिली। इसके साथ ही पुराने संगठन के पुराने चेहरे प्रचार प्रसार से दूरी बनाए रहे। हरियाणवी नेताओं के साथ के बावजूद एनएसयूआइ तीसरे स्थान पर नहीं।

दिग्गजों का अनुभव नहीं आया एएसएपी के काम

इसके अलावा एएसएपी के लिए दिल्ली की पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया से लेकर पंजाब के सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर, आनंदपुर साहिब से सांसद मालविंदर कंग और मोगा के विधायक अमृतपाल सिंह सुखानंद सहित अन्य पार्टी के दिग्गज नेताओं की रणनीति भी चुनाव में कमाल नहीं कर पाई। एबीवीपी पर आरोप जड़ने में जुटी एबीवीपी मुद्दों पर दिशाहीन नजर आई।

इंटरनेट मीडिया बना चुनाव प्रचार का अहम हथियार

इस बार की चुनावी जंग मैदान से अधिक इंटरनेट मीडिया पर देखने को मिली। छात्र संगठनों ने कैंपेनिंग के लिए इंटरनेट मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। इसे जीत की राह बनाने में अहम हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

संगठनों ने इंटरनेट मीडिया के लिए विशेष रूप से वार रूम बनाए थे, जहां विशेष टीमें काम कर रही थीं। प्रत्याशियों के साथ भी अलग टीमें तैनात की गई थीं, जो उनकी हर गतिविधि की जानकारी आनलाइन अपडेट कर रही थीं।