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आज ही के दिन 359 यात्रियों की जान बचा बलिदान हुई थीं चंडीगढ़ की नीरजा, 23 साल की उम्र में दुनिया ने देखा हौसला

Published: Sat, 05 Sep 2026 07:36 PM (IST)

नीरजा भनोट ने विमान हाईजैक के दौरान अपनी जान की परवाह न करते हुए 359 यात्रियों की जान बचाई थी। ...और पढ़ें

चंडीगढ़ में जन्मीं नीरजा भनोट ने पेश की थी बहादुरी की मिसाल। (एआई जनरेटेड फोटो)

चंडीगढ़ में जन्मीं नीरजा भनोट ने पेश की थी बहादुरी की मिसाल। (एआई जनरेटेड फोटो)

HighLights

  1. विमान हाईजैक हुआ तो आतंकियों के सामने भी डटी रहीं।

  2. नीरजा की मौत पर भारत ही नहीं, पाकिस्तान भी रोया।

  3. किसी गलत चीज को देखकर चुप रह जाना संभव नहीं था।

मोहित पांडेेय, चंडीगढ़। 5 सितंबर 1986...कराची एयरपोर्ट पर पैन एम फ्लाइट 73 के हाईजैक के दौरान 359 यात्रियों की जान बचाकर नीरजा भनोट खुद बलिदान हो गईं थी। चंडीगढ़ में जन्मी नीरजा की उम्र तब 23 साल थी और उनका हौसला पूरी दुनिया ने देखा था। चार दशक बाद भी इसे कोई भूल नहीं पाया है।

यात्रियों को बचाते-बचाते जब नीरजा आतंकियों की गोलियों का शिकार हुईं तो भारत के साथ पाकिस्तान में भी उनकी मौत पर लोगों की आंखें नम हुईं। यही वजह है कि नीरजा को भारत ने मरणोपरांत अशोक चक्र और पाकिस्तान ने तमगा-ए-इन्सानियत से सम्मानित किया। 

नीरजा का साहस अचानक पैदा नहीं हुआ था। बचपन से ही वह गलत के खिलाफ आवाज उठाने और मुश्किल हालात में डटकर खड़े होने के लिए जानी जाती थीं। उनके भाई अखिल भनोट ने दैनिक जागरण से विशेष बातचीत के दौरान बताया कि नीरजा के लिए किसी गलत चीज को देखकर चुप रह जाना संभव नहीं था।

यही सोच बाद में उस समय उनके सबसे बड़े हथियार में बदल गई, जब कराची एयरपोर्ट पर चार हथियारबंद आतंकियों ने विमान को अपने कब्जे में ले लिया। सीनियर फ्लाइट पर्सर (क्रू मेंबर की हेड) के रूप में नीरजा ने खतरे को भांपते हुए तत्काल सूझबूझ दिखाई। उनकी कोशिशों से अमेरिकी पायलट विमान से बाहर निकलने में सफल रहे।

इसके बाद विमान में मौजूद यात्रियों की जिम्मेदारी नीरजा के कंधों पर आ गई। करीब 17 घंटे तक वह आतंकियों के बीच यात्रियों का हौसला बढ़ाती रहीं और मौका मिलते ही उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में जुटी रहीं।

बच्चों और अन्य यात्रियों को बचाने के दौरान आखिरकार वह खुद गोलियों की चपेट में आ गईं। उनकी शहादत ने न सिर्फ भारत को झकझोरा, बल्कि पाकिस्तान में भी उनकी बहादुरी को सम्मान मिला।

बहादुरी की कहानी सरहदों से लंबी

नीरजा का जन्म और शुरुआती पढ़ाई चंडीगढ़ में हुई थी। बाद में पिता के तबादले के कारण परिवार मुंबई चला गया, जहां पढ़ाई के दौरान उनका सफर माॅडलिंग से एयरलाइंस तक पहुंचा। लेकिन ग्लैमर की दुनिया से कहीं बड़ी उनकी पहचान वह साहस था, जो आखिरी सांस तक उनके साथ रहा।

जन्मदिन से महज दो दिन पहले शहीद हुई नीरजा आज भी चंडीगढ़ की उस बेटी के रूप में याद की जाती हैं, जिसकी जिंदगी भले छोटी रही, लेकिन उनकी बहादुरी की कहानी सरहदों से कहीं लंबी बन गई।

इत्तेफाक से माॅडल व एयरहोस्टेस बनीं

माडल बनने के बारे में बताते हुए अखिल ने कहा कि एक दिन नीरजा कालेज के बाहर खड़ी थी। इस दौरान बाॅम्बे मैगजीन के फोटोग्राफर ने गर्ल-नेक्स्ट-डोर आर्टिकल के लिए नीरजा की तस्वीरें खींचीं। इसके बाद उनके माॅडलिंग के आफर आने लगे।

वहीं, नीरजा की दोस्त निम्मी एयरहोस्टेस के लिए एक बार आडिशन के लिए गई थी। मेकअप करने के लिए निम्मी के साथ नीरजा भी गई थीं, जहां उनका चयन हो गया।