पंजाब में बच्चों को सिखाए जा रहे नशे की गिरफ्त से बचने के अचूक तरीके, शुरू हुआ 14 हफ्तों का एंटी-ड्रग कोर्स
पंजाब के स्कूलों में कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्रों के लिए 14 सप्ताह का विशेष नशा विरोधी पाठ्यक्रम शुरू किया गया है।
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8 डाक्यूमेंट्री फिल्मों से असली अनुभवों की सीख।
HighLights
कक्षा 9वीं से 12वीं के लिए 14 सप्ताह का पाठ्यक्रम
वास्तविक कहानियों और विशेषज्ञ वीडियो का उपयोग किया जाएगा
छात्रों को पीयर प्रेशर से निपटने के तरीके सिखाए जाएंगे
रोहित कुमार, जागरण चंडीगढ़। पंजाब के स्कूलों में विद्यार्थियों को अब नशे से दूर रहने की नसीहत सिर्फ भाषणों के जरिए नहीं दी जा रही। उन्हें उन लोगों की असली कहानी दिखाई जा रही है, जिन्होंने नशे की शुरुआत की, धीरे-धीरे उसकी लत में फंसे और फिर उससे बाहर निकलने के लिए संघर्ष किया।
इन कहानियों से विद्यार्थियों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि नशा किसी एक दिन में जिंदगी नहीं बदलता, बल्कि छोटी शुरुआत से धीरे-धीरे व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में ले सकता है।
साथ ही यह भी बताया जा रहा है कि लत लगने के बाद उससे बाहर निकलना केवल इच्छाशक्ति का मामला नहीं होता, बल्कि इसके लिए उपचार और विशेषज्ञ मदद की जरूरत पड़ सकती है।
शिक्षा विभाग ने इसी सोच के साथ कक्षा नौवीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए 14 सप्ताह का विशेष नशा विरोधी पाठ्यक्रम तैयार किया है।
राज्य के करीब 3600 सीनियर सेकेंडरी स्कूलों के 7.5 लाख से अधिक विद्यार्थी इसके दायरे में आएंगे। जे-पाल से जुड़े सहयोगी संस्थानों के साथ तैयार किए गए इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को वास्तविक अनुभवों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है।
कहानी के जरिए समझते हैं नशे की शुरुआत और उसका असर
पाठ्यक्रम में शामिल आठ डाक्यूमेंट्री फिल्मों में नशे की चपेट में आए लोगों की वास्तविक जिंदगी दिखाई गई है। विद्यार्थी देखते हैं कि किस तरह नशे की शुरुआत हुई, इसका परिवार और व्यक्तिगत जीवन पर क्या असर पड़ा और लत से बाहर निकलने के दौरान किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
इससे नशे के खतरे को केवल किताब में पढ़ने या किसी शिक्षक का भाषण सुनने के बजाय वास्तविक व्यक्ति के अनुभव के रूप में समझने का मौका मिलता है।
इसी तरह दो विशेषज्ञ वीडियो भी तैयार किए गए हैं।
इनमें एक विद्यार्थियों और दूसरा अभिभावकों के लिए है। विशेषज्ञों के माध्यम से यह समझाया जाता है कि नशे की निर्भरता के दौरान मस्तिष्क में किस तरह बदलाव आते हैं और व्यक्ति के लिए इसे छोड़ना मुश्किल क्यों हो सकता है।
चिट्टे को लेकर बदली धारणा
कार्यक्रम के शुरुआती परिणामों में भी विद्यार्थियों की समझ में बदलाव सामने आया है। विभाग के अनुसार चिट्टे को एक बार आजमाने से गंभीर रूप से इसकी लत लगने का खतरा समझने वाले विद्यार्थियों का अनुपात 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
वहीं करीब 80 प्रतिशत विद्यार्थी अब मानते हैं कि नशे की लत से बाहर निकलने के लिए केवल इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं है। पहले यह अनुपात 46 प्रतिशत था।
दोस्तों के दबाव में कैसे कहें 'नहीं', यह भी सीख रहे
पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पीयर प्रेशर से निपटना है। विद्यार्थियों को बताया जा रहा है कि यदि दोस्त या साथी नशा करने के लिए दबाव डालें तो किस तरह स्थिति को संभालना है।
इसके लिए विनम्रता से मना करना, कारण बताना, वहां से हट जाना, बातचीत का विषय बदलना, हास्य का इस्तेमाल करना और पहले से अपना जवाब तैयार रखना जैसे व्यावहारिक तरीके सिखाए जा रहे हैं।
अभिभावकों को शुरुआती बदलाव पहचानने की जानकारी
अभिभावकों को भी अभियान से जोड़ा गया है। कार्यशालाओं में बच्चों के व्यवहार और स्वास्थ्य में होने वाले बदलावों को पहचानने की जानकारी दी जा रही है। आंखों का लाल होना, शरीर पर सिरिंज के निशान और अत्यधिक थकान जैसे संकेतों पर ध्यान देने तथा बच्चों के साथ लगातार संवाद बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।
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