'सतलुज' फिल्म पर थमा नहीं विवाद, पूर्व CM बेअंत सिंह की छवि को लेकर छिड़ी बहस; पोते रवनीत बिट्टू ने तथ्यों पर जताई आपत्ति
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' में पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के चित्रण को लेकर विवाद गहरा गया है।

रवनीत बिट्टू ने सतुलज के तथ्यों पर जताई आपत्ति (File Photo)
HighLights
फिल्म 'सतलुज' में पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के चित्रण पर विवाद
पोते रवनीत बिट्टू ने फिल्म के तथ्यों पर कड़ी आपत्ति जताई
बेअंत सिंह की विरासत और आतंकवाद विरोधी भूमिका पर फिर से बहस
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म "सतलुज" को पंजाब के गांवों में सार्वजनिक स्थलों और गुरुद्वारों में बड़े पर्दे पर दिखाने की प्रक्रिया के दौरान आतंकवाद का खात्मा करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की भूमिका फिर चर्चा में आ गई है।
पंजाब में एक वर्ग जहां बेअंत सिंह को आतंकवाद को खत्म करने का श्रेय देकर उन्हें बलिदानी का दर्जा देता है, वहीं कट्टरपंथी सोच के लोग उन्हें सिखों का कातिल करार देकर विरोध करते हैं।
15 साल तक कांग्रेस में रहे बिट्टू
बेअंत का परिवार भी उनके बलिदान को राजनीति में हमेशा भुनाता आ रहा है। केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस में 15 वर्ष से ज्यादा समय तक रहे। पंजाब यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।
साल 2024 में भाजपा में शामिल होने के बाद भी उन्होंने दादा के बलिदान को "पंजाब की शांति व विकास" के नैरेटिव से जोड़कर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया। उनका कहना है कि बेअंत सिंह किसी पार्टी के नहीं हैं।
बम धमाके में हुई थी बेअंत सिंह की हत्या
वह राष्ट्रवाद के पक्षधर थे और उनकी छवि हमेशा आतंकवाद विरोधी रही। सतलुज फिल्म में दिखाए गए दादा बेअंत सिंह के किरदार पर बिट्टू ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि फिल्म में गलत जानकारी दी गई है। बिट्टू का कहना है कि अगस्त 1995 में दादा बेअंत सिंह की बम धमाके में हत्या कर दी गई थी, जबकि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण 6 सितंबर 1995 को हुआ था।
अब लोग भी इस बात पर बहस कर रहे हैं कि फिल्म में इन तथ्यों को किस तरह से प्रस्तुत किया गया है। विपक्षी राजनीतिक दल के नेताओं में भी सतलुज के मुद्दे पर जमकर बहस हो रही है। कुछ राजनीतिक दल पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।
इसका जवाब में बिट्टू ने शुक्रवार को पोस्ट डालते हुए लिखा कि 17 दिसंबर 1990 में राजपुरा के सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल निर्मल कांता पर भी फिल्म बनाई जानी चाहिए, जिनकी हत्या कर दी गई थी। आतंकियों ने स्कूली बच्चों के सामने उन्हें गोली मारी थी। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने गरीब बच्चों के ड्रेस कोड को बदलने के आदेश को पूरा करने के लिए कुछ समय मांगा था।
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