झुलसे चेहरों को नई जिंदगी... कौन हैं पंजाब के डॉ. चन्नजीव? 5700 से अधिक लोगों का फ्री में कर चुके हैं प्लास्टिक सर्जरी
प्लास्टिक सर्जन डॉ. चन्नजीव सिंह ने 5,700 से अधिक मरीजों की निःशुल्क सर्जरी कर उन्हें नया जीवन दिया है। भारतीय सेना और पंजाब स्वास्थ्य विभाग से सेवानि ...और पढ़ें
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जालंधर के सर्जन डॉ. चन्नजीव सिंह ने 5700 से अधिक लोगों को दी मुफ्त प्लास्टिक सर्जरी से नई जिंदगी।
HighLights
डॉ. चन्नजीव सिंह ने 5,700 से अधिक निःशुल्क सर्जरी की
भारतीय सेना और पंजाब स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त प्लास्टिक सर्जन
युद्ध पीड़ितों और जलने वालों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इलाज
जगदीश कुमार, जालंधर। किसी का चेहरा आग में झुलस गया हो, किसी बच्चे के हाथ जलने से मुड़ गए हों या युद्ध और आतंकी हमले में घायल व्यक्ति अपना चेहरे को क्षतिग्रस्त कर बैठा हो। ऐसे लोगों के लिए प्लास्टिक सर्जन डॉ. चन्नजीव सिंह नई जिंदगी देने वाले चिकित्सक हैं।
भारतीय सेना और पंजाब के स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त 64 वर्षीय डॉ. चन्नजीव सिंह कहते हैं कि संविधान ने प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य का अधिकार दिया है, लेकिन जब इलाज महंगा हो जाए तो यह अधिकार गरीबों के लिए अधूरा रह जाता है।

इसी सोच ने उन्हें उन लोगों तक पहुंचने की प्रेरणा दी, जिनके लिए प्लास्टिक सर्जरी का खर्च उठाना संभव नहीं था। अब तक वह सरकारी सेवाओं के अतिरिक्त 5,700 से अधिक मरीजों की निशुल्क प्लास्टिक सर्जरी कर चुके हैं। कई बार उन्होंने अपनी जेब से मरीजों की दवाएं और सर्जरी का सामान तक खरीदा।
डॉ. चन्नजीव का सेवा सफर वर्ष 1992 में भारतीय सेना से शुरू हुआ। 22 वर्ष तक उन्होंने युद्ध क्षेत्रों, आतंकी हमलों और प्राकृतिक आपदाओं में घायल लोगों का उपचार किया। जंग के मैदान में झुलसे सैनिकों, महिलाओं और बच्चों की पीड़ा ने उनके भीतर एक संकल्प पैदा किया कि सेवानिवृत्ति के बाद वह अपना अनुभव उन गरीब मरीजों के लिए समर्पित करेंगे, जिन्हें इलाज की सबसे अधिक जरूरत है।
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सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पंजाब स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाली। पूरे विभाग में वह लंबे समय तक इकलौते प्लास्टिक सर्जन रहे। जनवरी 2021 में सिविल अस्पताल जालंधर से वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी (एसएमओ) के पद से सेवानिवृत्त होने तक उन्होंने हजारों जटिल सर्जरी करवाईं।

नौकरी के दौरान ही उन्होंने स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से निश्शुल्क प्लास्टिक सर्जरी शिविर शुरू कर दिए थे। वह कहते हैं कि झुलसने से शरीर पर पड़े दाग, सिकुड़े अंग और बिगड़ा चेहरा उसे समाज से दूर कर देते हैं। ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति को उन्होंने इलाज के बीच कभी दीवार नहीं बनने दिया। कई बार उन्होंने अपनी जेब से मरीजों की दवाएं और सर्जरी का सामान तक खरीदा।
उनकी सेवा देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। ओमान, गाजा, सूडान, जार्डन, सीरिया, ईराक तथा दक्षिण एशिया के सात देशों में वह वालंटियर प्लास्टिक सर्जन के रूप में युद्ध पीड़ितों का उपचार कर चुके हैं। नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के दौरान वे अपने खर्च पर वहां पहुंचे और घायल लोगों की सर्जरी कर उन्हें नई जिंदगी दी।
इसके लिए उन्हें रेड एंड व्हाइट ब्रेवरी अवार्ड से सम्मानित किया गया। पेरिस, हालैंड, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड और जर्मनी में भी उन्होंने स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिलकर बर्न मरीजों के निशुल्क ऑपरेशन किए। हाल ही में मध्य प्रदेश के मुरैना तथा जम्मू-कश्मीर के डोडा, किश्तवाड़ और भद्रवाह में भी उन्होंने सर्जरी शिविर लगाए। पिछले वर्ष अफगानिस्तान के कुंदुज स्थित नए बर्न यूनिट में गंभीर मरीजों का उपचार किया।ल इसके अलावा युवा डॉक्टरों के लिए डॉ. चन्नजीव ने चिकित्सा शिक्षा पर 11 शोध पत्र लिखे और अपने 22 वर्षों के अनुभव के आधार पर 12 शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत किए।
हिमाचल प्रदेश व पंजाब सरकार कर चुकी सम्मानित

उनकी सेवाओं को हिमाचल प्रदेश और पंजाब सरकार सम्मानित कर चुकी हैं। वे मिशन इंडिया, ऑपरेशन रेनबो कनाडा, वूमेन फार वूमेन, आइपीआरएएस और वूमेन हेल्थ जैसी अनेक संस्थाओं से जुड़े हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका सेवा भाव नहीं बदला। पंजाब के सरकारी अस्पतालों में प्लास्टिक सर्जन न होने की स्थिति को देखते हुए उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को स्वयं प्रस्ताव दिया कि वे सिविल अस्पताल जालंधर के बर्न यूनिट में निशुल्क सेवाएं देंगे।
मानसिक रूप से मजबूती के लिए करता हूं मेडिटेशन : डॉ. चन्नजीव
डॉक्टर दिवस के थीम ( मास्क के पीछे : चिकित्सकों को कौन ठीक रखता है) पर बात करते हुए डॉ. चन्नजीव सिंह कहते हैं कि मरीज का दर्द देखकर भावुक होना स्वाभाविक है, लेकिन वर्षों तक युद्ध, भूकंप और आग में झुलसे लोगों का इलाज करते-करते उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाना सीखा है। वे बताते हैं कि मानसिक संतुलन बनाए रखना भी डॉक्टर के लिए अहम है।

इसके लिए वे नियमित रूप से मेडिटेशन (ध्यान) करते हैं। ध्यान से मन शांत रखता है, तनाव कम होता है और कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। यही मानसिक अनुशासन उन्हें हर दिन नए मरीजों के दर्द का सामना करने और पूरे समर्पण के साथ उनकी सेवा करने की शक्ति देता है।