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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 13, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

लुधियाना: कमजोर स्वास्थ्य सुविधाएं लील लेती हैं लोगों की जिंदगी

By Krishan KumarEdited By:
Published: Fri, 13 Jul 2018 06:00 AM (IST)

विवान सिंह गिल कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने को लेकर सरकार को प्राइवेट सेक्टर को सपोर्ट करना चाहिए।

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किसी भी देश में स्वास्थ्य सेवा लोगों का सबसे पहला बुनियादी अधिकार है। इसके विपरीत भारत में माकूल चिकित्सा सुविधाएं न मिल पाने की वजह से बहुत सारे लोग असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं। हमारी सरकार हेल्थकेयर पर अपनी जीडीपी का केवल लगभग 1.4 प्रतिशत ही खर्च करती है, जो वैश्विक तौर पर सबसे कम खर्चों में से एक है, जबकि इसके विपरीत हमारे पड़ोसी मुल्क स्वास्थ्य बजट पर कहीं अधिक खर्च करते हैं।

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जैसे अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत, नेपाल 5.8 प्रतिशत, ब्राजील 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत खर्च करता है। वहीं यूरोप स्वास्थ्य सेवा पर लगभग 17 प्रतिशत खर्च करता है। जबकि इन देशों की आबादी भारत के मुकाबले बहुत कम है।

हेल्थकेयर में धन की कमी सबसे बड़ी बाधा

हमारे देश में हेल्थकेयर क्षेत्र में धन की कमी सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। हालांकि कहने के लिए तो सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर बड़ी संख्या में सरकारी अस्पताल, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर, प्राइमरी हेल्थ सेंटर और डिस्पेंसरियां खोल रखी है।

लेकिन, क्या सरकार के किसी आला अधिकारी ने सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर देखा है कि वाकई में यहां एक बीमार इंसान के इलाज की पर्याप्त व्यवस्थाएं, सुविधाएं, डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ है या नहीं। शायद कभी नहीं देखा। पीजीआई और एम्स को छोड़ दिया जाए, तो अन्य तमाम स्वास्थ्य स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों के इलाज के लिए न तो पर्याप्त संख्या में  स्‍टाफ है, न डॉक्टर है, न इक्यूपमेंटस है।

 

निजी अस्पताल न हों तो धराशाई हो जाएं स्वास्थ्य सेवाएं

विवान सिंह कहते हैं कि निशुल्क दवाओं के नाम पर भी खानापूर्ति हो रही है। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी और सुविधाओं का अभाव होने के कारण ही मरीजों को अंतिम विकल्प के तौर पर निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है।

निजी अस्पताल सुपर स्पेशलिस्ट चिकित्सकों के साथ विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ हर तरह का इलाज प्रदान करते हैं और उसी के मुताबिक मरीज से फीस ले रहे हैं। ऐसे में लोगों को लगता है कि निजी अस्पतालों में इलाज काफी महंगा है। जबकि यदि निजी अस्पताल न हो, तो स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बुरी तरह से धराशाही हो जाएगी।

पड़ोसी मुल्कों से सीख लेकर सेहत बजट बढ़ाना जरुरी

विवान सिंह गिल कहते हैं कि अगर सरकार वाकई में भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार लाना चाहती है, तो पड़ोसी मुल्कों से सीख लेकर सबसे पहले तो स्वास्थ्य के बजट को बढ़ाए। यदि बजट बढ़ेगा, तो फंड बढ़ने से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार आएगा। लेकिन यदि सरकार हेल्थ केयर के लिए बजट को नहीं बढ़ा सकती, तो प्राइवेट हेल्थ सेक्टर को प्रोत्साहित करें। प्राइवेट हेल्थ सेक्टर को सरकार को इनसेंटिव देना चाहिए। मसलन, सस्ती जमीन, सस्ती बिजली, इनकम टैक्स में छूट, इक्यूपमेंटस खरीदने पर रिबेट दी जानी चाहिए। यदि यह सुविधाएं सरकार की तरफ से प्राइवेट हेल्थ सेक्टर को मिलेंगी, तो शहर में ज्यादा से ज्यादा अस्पताल खुलेंगे, जिससे घर के नजदीक ही नागरिकों को इलाज मिलेगा।

ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को लिए सपोर्ट करे सरकार
गिल कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने को लेकर सरकार को प्राइवेट सेक्टर को सपोर्ट  करना चाहिए। गांव के लोगों को इलाज के लिए शहरों में आना पड़ता है। प्राइवेट हेल्थ सेक्टर को सुविधाएं मिलने पर वह इलाज को सस्ता भी करेंगे। क्योंकि सुविधाएं और रिबेट मिलने पर प्राइवेट हेल्थ सेक्टर के खर्चों में भी कटौती होगी। मेडिसिन मैन्युफैक्चर्स को भी सरकार रियायतें दे। खासकर, जो लाइफ सेविंग ड्रग्स बनाते हैं। यदि मैन्युफैक्चर्स को छूट मिलेगी, तो उसका असर दवाओं की कीमत पर पड़ेगा।

- विवान सिंह गिल

(फोर्टिस अस्पताल के फैसिलिटी डायरेक्टर हैं )

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