पहली बार ड्रोन से होगी खेतों की निगरानी, पराली को आर्थिक संसाधन में बदलने पर जोर; पंजाब सरकार ने तैयार किया रोडमैप
पंजाब सरकार ने 2030 तक पराली जलाने की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए पांच साल का रोडमैप ...और पढ़ें

पहली बार ड्रोन से होगी खेतों की निगरानी (फाइल फोटो)
HighLights
पंजाब सरकार का 2030 तक शून्य पराली जलाने का लक्ष्य।
पराली प्रबंधन के लिए पांच साल का विस्तृत रोडमैप तैयार।
ड्रोन से निगरानी और फसल विविधीकरण पर विशेष जोर।
जागरण संवाददाता, पटियाला। खेतों में पराली जलाने की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए पंजाब सरकार ने 2030 तक जीरो पराली बर्निंग का लक्ष्य तय करते हुए पांच साल का रोडमैप तैयार किया है।
पराली के प्रबंधन से लेकर फसल विविधीकरण, आधुनिक कृषि मशीनरी, बायोमास उद्योग, बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट तक कई स्तरों पर रणनीति तैयार की गई है।
सरकार का जोर केवल किसानों पर कार्रवाई करने के बजाय पराली को खेतों से बाहर निकालकर आर्थिक संसाधन में बदलने पर भी है। पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी के लिए इस बार तकनीक का दायरा बढ़ाया जा रहा है। पंजाब में पहली बार ड्रोन के जरिये खेतों की निगरानी की जाएगी।
खास तौर पर बाद दोपहर से रात तक के उस समय पर नजर रखी जाएगी, जब कुछ किसान सैटेलाइट से बचने के लिए पराली जलाने का प्रयास करते हैं।
दोपहर तीन से रात नौ बजे तक के समय को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है। सरकारी आकलन के अनुसार इस सीजन में करीब 31 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र से 18.81 लाख मीट्रिक टन पराली पैदा होने का अनुमान है। प्रबंधन के लिए इन-सीटू और एक्स-सीटू दोनों तरीकों को अपनाया जा रहा है।
योजना के तहत 1,58,898 सब्सिडी वाली कृषि मशीनों की मदद से करीब 10.15 लाख मीट्रिक टन पराली को खेत में ही मिलाने का लक्ष्य है। एक्स-सीटू प्रबंधन के तहत करीब 7.08 लाख मीट्रिक टन पराली को बायोमास और बायोगैस प्लांटों में इस्तेमाल किया जाएगा। करीब 0.86 लाख मीट्रिक टन पराली चारे के लिए इस्तेमाल होगी।
सरकार की रणनीति का बड़ा हिस्सा फसल विविधीकरण भी है। इसके तहत आने वाले वर्षों में करीब सात लाख हेक्टेयर धान का रकबा कम करने का लक्ष्य रखा है, ताकि पराली की मात्रा में ही कमी लाई जा सके।
पांच साल में 54 प्रतिशत की गिरावट
कुछ वर्षों में मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। 2020 में 76,929 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2024 में यह संख्या घटकर 10,909 रह गई जबकि वर्ष 2025 में 5,114 मामले दर्ज हुए। यानी 2024 की तुलना में 2025 में करीब 54 प्रतिशत की कमी आई। हालांकि कुल मामलों का बड़ा हिस्सा चुनिंदा जिलों में केंद्रित रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक संगरूर, फिरोजपुर, बठिंडा, मोगा, मुक्तसर, मानसा, तरनतारन और फरीदकोट में ही करीब 67 प्रतिशत यानी 3,454 मामले सामने आए। संवेदनशील जिलों में निगरानी और कार्रवाई के लिए 12 हजार से अधिक अधिकारियों को तैनात किया गया।
एफआइआर और रेड एंट्री से सख्ती का संदेश
सरकार ने पराली जलाने पर कार्रवाई के लिए प्रशासनिक और कानूनी दोनों स्तरों पर सख्ती बढ़ाई है। पिछले साल नियमों का उल्लंघन करने वाले किसानों के खिलाफ 1,963 एफआइआर दर्ज की गई, जबकि 2,176 किसानों के जमाबंदी रिकार्ड में रेड एंट्री की गई।
अब बढ़े हुए पर्यावरणीय मुआवजे के साथ किसानों के लिए नियम तोड़ना और महंगा हो गया है। पांच वर्षीय रोडमैप की खासियत यह है कि इसमें पराली को केवल कचरा मानकर निपटाने के बजाय उपयोग की पूरी शृंखला तैयार करने पर जोर दिया गया है। अब चुनौती यह होगी कि तैयार किए गए रोडमैप को गांव स्तर तक कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है।
