निर्जला एकादशी 2026: कठिन लेकिन फलदायी! कब किया जाएगा साल की सबसे बड़ी एकादशी का व्रत?
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता हैं। इस दिन पर अन्न के साथ-साथ जल ग्रहण करने की भी मनाही होती है। ...और पढ़ें

जानें निर्जला एकादशी की तिथि और महत्व (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
निर्जला एकादशी को माना जाता है सबसे महत्वपूर्ण व्रत
इस व्रत को करने से मिलता है सभी एकादशियों का फल
महाभारत की कथा से जुड़ी है यह भीमसेनी एकादशी
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली , इसी कारण इसे 'निर्जला एकादशी' या 'भीमसेनी एकादशी' कहा जाता है। साल की सभी 24 एकादशियों में से निर्जला एकादशी को सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से साधक को साल की सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है। ऐसे में चलिए जानते हैं कि इस साल निर्जला एकादशी कब मनाई जाएगी।
कब किया जाएगा निर्जला एकादशी व्रत?
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जून को शाम 6 बजकर 12 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 25 जून को रात 8 बजकर 9 मिनट पर होगा। हिंदू धर्म में व्रत सूर्योदय व्यापिनी तिथि के अनुसार रखे जाते हैं, इसलिए उदया तिथि के कारण निर्जला एकादशी का व्रत गुरुवार, 25 जून को किया जाएगा।

निर्जला एकादशी का महत्व
साल की सभी 24 एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। भीमसेनी एकादशी के दिन जल ग्रहण नहीं किया जाता, इसलिए इसे निर्जला व्रत कहते हैं। माना जाता है कि जो भी भक्त भोजन और पानी के बिना निर्जला एकादशी का उपवास करता है, उसे साल की सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं। ऐसे में जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है, उन्हें लिए यह व्रत किसी वरदान से कम नहीं है।
निर्जला एकादशी क्यों मनाई जाती है?
निर्जला एकादशी को 'पांडव एकादशी' या 'भीमसेनी एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे महाभारत काल की एक बहुत ही रोचक पौराणिक मिलती है। कथा के अनुसार, पांचों पांडवों में भीमसेन (भीम) खाने-पीने के अत्यधिक शौकीन थे। उनके लिए अपनी भूख पर नियंत्रण रख पाना लगभग मुश्किल था। यही कारण था कि जहां अन्य पांडव और द्रौपदी साल की सभी एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करते थे, वहीं भीम अपनी तेज भूख के कारण कभी भी एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे।
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महर्षि व्यास ने बताया ये उपाय
अपने परिवार को व्रत करता देख भीमसेन को बहुत आत्मग्लानि महसूस होती थी। उन्हें लगता था कि व्रत न कर पाने के कारण वह भगवान श्रीहरि का अनादर कर रहे हैं। तब वह इस समस्या का समाधान खोलने के लिए महर्षि वेदव्यास के पास गए। भीमसेन की परेशानी सुनकर महर्षि वेदव्यास ने कहा, "हे भीम! यदि तुम साल भर की चौबीस एकादशियों का व्रत नहीं कर सकते, तो केवल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली 'निर्जला एकादशी' का व्रत करो। इस दिन अन्न तो दूर, जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करनी है।
यदि तुम केवल यह एक व्रत पूरी निष्ठा से कर लोगे, तो तुम्हें साल भर की सभी चौबीस एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य मिलेगा।" महर्षि व्यास की आज्ञा मानकर भीमसेन ने इस अत्यंत कठिन निर्जला एकादशी का व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ पूरा किया। इसी कारण, भगवान विष्णु को समर्पित इस एकादशी को 'भीमसेनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।