पुत्रदा एकादशी कथा: राजा सुकेतुमान के प्राण त्यागने के निर्णय के पीछे क्या था वो गहरा कारण?
पुत्रदा एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसे संतान प्राप्ति के लिए रखा जाता है। इसकी कथा राजा सुकेतुमान ...और पढ़ें

श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी से जुड़ी कथा (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। प्रत्येक माह की 11वीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। यह महीने में 2 बार (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) आती है। एकादशी तिथि खासतौर पर भगवान विष्णु की पूजा और व्रत के लिए समर्पित है।
अगस्त महीने में भी दो एकादशी तिथि है। जिसमें पहली कामिका एकादशी और दूसरी पुत्रदा एकादशी है। कामिका एकादशी निकल चुकी है और अब 23 अगस्त 2026 को श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा।
शास्त्रों के मुताबिक, किसी भी व्रत को रखने से पहले उसकी महिमा और पौराणिक कथा के बारे में मालूम होना चाहिए। खुद भगवान श्रीकृष्ण पांडव ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा के बारे में बताते हुए कहते हैं कि, इस संसार में पुत्रदा एकादशी के समान कोई दूसरा व्रत नहीं है। इस व्रत को रखने से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मी कृपा को पात्र बनता है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी कथा
भद्रावती नाम की एक नगरी में सुकेतुमान नाम का राजा शासन करता था। राजा के पास धन-धान्य, सुख-सुविधा और विलासिता तो थी, लेकिन पुत्र न होने की कमी हमेशा सताती थी। राजा की पत्नी का नाम शैव्या था। संतान सुख की चाह सिर्फ राजा में ही नहीं, बल्कि पितरों में भी थी, क्योंकि उनका मानना था कि राजा के मरने के बाद हमें पिंड कौन देगा?
राजा हमेशा इसी ख्याल में डूबा रहता था कि, मरने के बाद मेरा अंतिम संस्कार कौन करेगा? बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण कैसे चुकेगा? अधिक सोचने के कारण राजा इस कदर चिंतित हो गया कि, उसने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया लेकिन आत्महत्या को पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया।
एक दिन राजा अपने विचारों में डूबे हुए घोड़े पर सवार होकर वन की ओर चल दिया। वन में चलते-चलते उसने देखा कि, जंगल में हिरण, बाघ, सूअर, शेर, बंदर, सांप आदि सब भ्रमण कर रहे हैं। हाथी अपने परिवार के साथ जंगल में घूम रहा था।
वन में अलग-अलग दृश्यों को देखकर वह सोचने लगा कि, मैंने काफी यज्ञ हवन, ब्राह्मणों को खाना खिलाया फिर भी मुझे दुख ही क्यों मिला? वन में अधिक घूमने के कारण राजा प्यास के मारे अत्यंत दुखी होकर इधर-उधर पानी की खोज करने लगा। तभी राजा को एक सरोवर दिखाई दिया। जिसके चारों तरफ मुनियों का आश्रम बना हुआ था।
राजा को देखकर मुनियों ने कहा कि, हे राजन! हम तुमसे काफी खुश हैं। बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है? राजा ने पूछा महर्षि आप लोग यहां क्यों आए हैं? तब मुनियों ने बताया कि, आज संतान प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस तालाब में नहाने के लिए आए हैं।
यह सुनकर राजा कहने लगा कि, मेरी भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ से खुश हैं तो एक पुत्र का वरदान दे दीजिए। मुनि बोले- हे राजन, आज पुत्रदा एकादशी है। आप इस व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करें भगवान के आशीर्वाद से आपके घर में जरूर एक पुत्र होगा।
मुनि की बातों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी व्रत किया और द्वादशी तिथि पर पारण किया। जिसके फल स्वरूप कुछ समय बाद राजा की पत्नी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। वह बच्चा आगे चलकर अत्यंत शूरवीर राजकुमार बना।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे राजन, पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
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