ना मूर्ति, ना कोई तस्वीर... इस मंदिर में क्यों मिट्टी के हाथी चढ़ाते हैं लोग? वजह जानकर रह जाएंगे हैरान!
झारखंड के दलमा इलाके में स्थित हाथी खेदा ठाकुर मंदिर (Hathi Kheda Mandir) अपनी 300 साल पुरानी अनोखी परंपरा के ...और पढ़ें

हाथी खेड़ा ठाकुर मंदिर, झारखंड (Picture Credits- AI Images)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत के झारखंड में एक ऐसा भी मंदिर है, जो अपनी खास मान्यताओं और परंपराओं के लिए जाना जाता है। घने जंगलों, ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसे इस मंदिर का नाम 'हाथी खेदा ठाकुर मंदिर' (Hathi Kheda Temple) है।
यह मंदिर देशभर के आम मंदिरों से काफी अलग है, क्योंकि यहां किसी देवी-देवता की प्रतिमा की पूजा नहीं होती है, बल्कि मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु मिट्टी से बने हाथियों की पूजा करते हैं। माना जाता है कि, मंदिर से जुड़ी यह अनोखी परंपरा करीब 300 साल पुरानी है।
हाथी खेदा ठाकुर मंदिर की कहानी
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, प्राचीन समय में दलमा इलाके में जंगली हाथियों का काफी आतंक था। ऐसे में हाथियों के झुंड रात होते ही गांव में घुस आते थे। जंगली हाथियों के दहशत के कारण गांव वाले रात-रात भर पहरा देकर ग्रामीणों की रक्षा करते थे। गांव के लोग हाथियों को दूर करने के लिए मशालें जलाने के साथ ढोल-नगाड़े भी बजाते थे। इतना कुछ करने के बाद भी उनकी ये समस्या खत्म नहीं हुई।
माना जाता है कि, गांव के बुजुर्गों ने ग्रामीणों को मिट्टी से बने हाथी बनने और उनकी पूजा करने की सलाह दी। इसके बाद गांव के लोगों ने मिट्टी से बने हाथियों की पूजा शुरू कर दी। बताया जाता है कि, ऐसा करने से कुछ समय बाद गांव में हाथियों का आना कम होते चला गया। गांव वालों का मानना था कि, हाथी खेदा ठाकुर की कृपा से हाथियों का आतंक खत्म हो गया था। इन बातों को ध्यान में रखकर कुछ समय बाद यहां पर पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू हो गई। गांव वालों के इसी विश्वास के साथ आज 300 साल बाद भी हाथी खेदा ठाकुर मंदिर में पूजा की जाती है।
'हाथी खेदा ठाकुर' नाम का मतलब
हाथी खेदा ठाकुर (Jamshedpur Hathi Kheda Mandir) नाम भी मंदिर की मान्यता से जुड़ा है। स्थानीय भाषा में 'खेदा' का मतलब भगाने या दूर करने से जोड़ा जाता है। यानी हाथी खेदा का मतलब है जंगली हाथियों के आतंक से बचाव और उन्हें गांव से दूर रखने के लिए की जाने वाली प्रार्थना से है। यही कारण है कि, यहां आज भी मिट्टी के हाथियों को चढ़ाने की परंपरा निभाई जा रही है।
मंदिर देवी-देवता की पारंपरिक मूर्ति नहीं
हाथी खेदा मंदिर की सबसे खास बात यह है कि, मंदिर के अंदर किसी भी पारंपरिक देवी-देवता की मूर्ति स्थापित नहीं है। इसके बजाय मंदिर में पारंपरिक रूप से मिट्टी के बने हाथियों की पूजा की जाती है।
मंदिर प्रांगण में अलग-अलग आकार के मिट्टी से बने हाथियों की प्रतिमा देखने को मिलती है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं और पूजा करने के बाद मिट्टी के हाथी अर्पित करते हैं। इसके अलावा मंदिर में नारियल, चुनरी, धूप और दीप भी चढ़ाया जाता है।
मंदिर में बलि देने की अनोखी परंपरा
मंदिर से जुड़ी स्थानीय परंपराओं में पशु बलि देने का भी जिक्र मिलता है। मंदिर में आने वाले कुछ श्रद्धालु सदियों से चली आ रही है मान्यता के मुताबिक, बकरे या भेड़ की बलि देते हैं। बलि देने की परंपरा को स्थानीय और धार्मिक रीति-रिवाज का ही हिस्सा माना जाता है।
प्रसाद से जुड़ी अनोखी मान्यता
हाथी खेदा मंदिर की मान्यताओं के मुताबिक, मंदिर का प्रसाद महिलाओं को ग्रहण करने को नहीं दिया जाता है। इसके अलावा मंदिर परिसर से प्रसाद को बाहर ले जाना या घर लाना भी वर्जित माना जाता है। ये नियम स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं का हिस्सा है, जिसका पालन मंदिर में दर्शन के लिए आने वाली सभी श्रद्धालु करते हैं।
मंदिर में कब रहती है ज्यादा भीड़?
मकर संक्रांति,चैत्र महीने और स्थानीय आदिवासी पर्वों के दौरान मंदिर में श्रद्धालु की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इसके अलावा मंगलवार और रविवार को भी सामान्य दिनों की तुलना में भारी भीड़ देखने को मिलती है। इन खास मौकों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं और मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं।
दलमा पहाड़ियों और हाथियों के बीच गहरा संबंध
हाथी खेदा मंदिर के आसपास के जंगलों में आज भी जंगली हाथियों की मौजूदगी देखने को मिलती है। कई बार हाथियों के झुंड खाने की खोज में आसपास के गांवों तक पहुंच जाते हैं। इसी कारण से हाथी खेदा मंदिर की लोकआस्था का संबंध सिर्फ धार्मिक विश्वासों से ही नहीं, बल्कि इंसान और जंगलों में रहने वाले जीवों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को भी दर्शाता है।
यह भी पढ़ें- बिहार का रहस्यमयी 'वन देवी मंदिर': जहां सूर्यास्त के बाद जाना है सख्त मना, जानिए इसकी पौराणिक कहानी
यह भी पढ़ें- फूल-मिठाई नहीं, भारत के इन अनोखे मंदिरों में मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं रिज्यूम, लौकी और घंटियां
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
