Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 17, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    Sanwalia Seth Temple: भगवान श्रीकृष्ण को क्यों कहा जाता है सांवलिया सेठ? इस राज्य में है भव्य मंदिर

    By Pravin KumarEdited By: Pravin Kumar
    Updated: Wed, 17 Jul 2024 09:02 PM (IST)

    भगवान श्रीकृष्ण (Sanwalia Seth Temple) की लीला अपरंपार है। अपने भक्तों की विशेष परीक्षा लेते हैं। एक बार परीक्षा में पास होने के बाद साधक यानी भक्त का ...और पढ़ें

    Sanwalia Seth Temple In Rajasthan: सावंलिया सेठ मंदिर का इतिहास ( Image Credit: mshrisanwariyaseth.org)
    Sanwalia Seth Temple In Rajasthan: सावंलिया सेठ मंदिर का इतिहास ( Image Credit: mshrisanwariyaseth.org)

    HighLights

    1. भगवान श्रीकृष्ण को जगत का पालनहार भी कहा जाता है।
    2. बुधवार के दिन मुरली मनोहर संग श्रीजी की पूजा की जाती है।
    3. सांवलिया सेठ मंदिर में प्रभु के दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Sanwaliya Seth Temple: सनातन धर्म में बुधवार का दिन भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित होता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण एवं राधा रानी की पूजा की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) की महिमा अपरंपार है। अपने भक्तों के सभी दुख हर लेते हैं। साथ ही साधकों का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता ज्ञान के दौरान अपने परम भक्त अर्जुन से कहते हैं- पार्थ! जो भी व्यक्ति सच्चे मन से मेरी शरण में आता है। मैं उसके सभी दुखों का अंत और पापों का नाश करता हूं। साथ ही भक्त की हर मनोकामना अवश्य ही पूरी करता हूं। मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया के शरणागत रहने वाले भक्तों को मृत्यु उपरांत बैकुंठ धाम में उच्च स्थान प्राप्त होता है। अतः साधक श्रद्धा भाव से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-उपासना करते हैं। साथ ही पूजा के समय 'हरे कृष्णा हरे राम' मंत्र का जप करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के कई नाम हैं। इनमें एक नाम सांवलिया सेठ है। क्या आपको पता है कि भगवान श्रीकृष्ण को सांवलिया सेठ क्यों कहा जाता है ? आइए, इसकी कथा और देश में स्थित सांवलिया सेठ मंदिर के बारे में जानते हैं-

    यह भी पढ़ें: जानें, क्यों तुलसीदास कृत रामचरितमानस पर भगवान श्रीराम का नहीं है हस्ताक्षर?


    कथा

    भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र सुदामा जी निर्धन थे। तत्कालीन समय में यह विधान था कि ब्राह्मण केवल और केवल तीन घर में भिक्षा मांग सकते थे। तीन घरों में प्राप्त भिक्षा से ही दैनिक जीवन व्यतीत करते थे। वर्तमान समय में भी सिद्ध महापुरुष साधना करने वाले साधकों को भिक्षा याचन के लिए केवल तीन घर जाने की सलाह देते हैं। सुदामा जी शिक्षा प्राप्त या ग्रहण करने के समय भगवान श्रीकृष्ण से मिले थे। उस समय दोनों के मध्य मित्रता हुई। वर्तमान समय में भी कृष्ण और सुदामा जी की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। कई अवसर पर सुदामा जी निर्धनता के चलते भगवान श्रीकृष्ण से मिलने उनके दरबार नहीं जा पाते थे।

    भगवान श्रीकृष्ण भी सुदामा जी के भाव से भली-भांति परिचित थे। अपनी लीला से सुदामा जी की परीक्षा लेते रहते थे। हालांकि, सुदामा जी की धर्मपत्नी सहायता हेतु भगवान श्रीकृष्ण के पास जाने की सलाह देती थीं, लेकिन सुदामा जी नकार देते थे। अति होने के बाद सुदामा जी हिम्मत कर भगवान श्रीकृष्ण से मिलने के लिए द्वारका पहुंचे। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला के जरिए सुदामा जी की मदद की।

    यात्रा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने मित्र बन सुदामा जी की पूरी सहायता की। यात्रा के पहले दिन संध्याकाल में सुदामा जी को अपने परिवार की चिंता सताने लगी। उस समय भगवान कृष्ण ने अपनी लीला की। तभी एक व्यक्ति दौड़ता हुआ उधर से गुजरा। वह व्यक्ति यह कहकर जा रहा था कि पास के गांव के सांवलिया सेठ के घर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसके लिए दस दिनों तक महायज्ञ किया जा रहा है। साथ ही दस दिनों तक आसपास के सभी नगरों में भंडारा किया जा रहा है।

    खबरें और भी

    सुदामा जी व्यक्ति को रोककर कहता है कि क्या पास के गांव में भी भोजन परोसा जा रहा है। सुदामा जी के सवाल पर व्यक्ति बोलता है-हां, आपके गांव में भी भंडारा किया जा रहा है। आप भी चलो, मैं तो भोजन लेने ही जा रहा हूं। यह सुन सुदामा जी की आत्मा तृप्त हो गई। उन्हें अपने भूखे बच्चे और पत्नी की चिंता चित्त से हट गई। इसके बाद सुदामा जी, ग्वाले कृष्ण जी के साथ भोजन किया। तत्कालीन समय से ही भगवान श्रीकृष्ण को सांवलिया सेठ कहा जाता है।

    सांवलिया सेठ मंदिर

    भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित सांवलिया सेठ मंदिर (Sanwalia Seth) राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि भोलाराम गुर्जर के कहने पर गांव वालों ने बागुंड गांव में भूमि खोदकर तीन मूर्तियां प्राप्त की थीं। इनमें प्रथम मूर्ति को मंडफिया और दूसरी को भादसोड़ा में स्थापित की गई। जबकि तीसरी मूर्ति को छापर में ही स्थापित की गई। इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया। मंडफिया में स्थित मंदिर ही सांवलिया धाम से जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण विराजते हैं। श्रद्धालु देश की राजधानी दिल्ली से रेल मार्ग या वायु मार्ग के जरिए चित्तौड़गढ़ पहुंच सकते हैं। चित्तौड़गढ़ से सांवलिया धाम सड़क मार्ग के जरिए जा सकते हैं।

    यह भी पढ़ें: कहां है कोकिला वन और क्या है इसका धार्मिक महत्व?

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।