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    श्री सूक्तम्: ऋग्वेद का वो गुप्त मंत्र जो मिटा देगा सात जन्मों की दरिद्रता, इस तरीके से करें पाठ

    Updated: Thu, 12 Mar 2026 05:20 PM (IST)

    क्या आप जानते हैं कि ऋग्वेद का श्री सूक्तम् (Shri Suktam) पाठ रंक को भी राजा बना सकता है? जानें मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने वाले इन सिद्ध मंत्रों की म ...और पढ़ें

    श्री सूक्तम् का पाठ (Image Source: AI-Generated)

    श्री सूक्तम् का पाठ (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। अक्सर हम जीवन में कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी बरकत नहीं होती। कभी कर्ज पीछा नहीं छोड़ता, तो कभी बेवजह के खर्च मानसिक तनाव बढ़ा देते हैं।

    हिंदू धर्म के अनुसार, ऐसे समय में 'श्री सूक्तम्' का पाठ एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह केवल कुछ मंत्रों का समूह नहीं, बल्कि माँ लक्ष्मी का साक्षात आशीर्वाद है।

    क्या है श्री सूक्तम्?

    श्री सूक्तम् ऋग्वेद से लिया गया एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। इसमें मां लक्ष्मी की स्तुति की गई है और उनसे प्रार्थना की गई है कि वे दरिद्रता (गरीबी) को दूर कर घर में सुख, समृद्धि और यश का वास करें। यह मां लक्ष्मी को उनके घर बुलाने का एक दिव्य निमंत्रण है।

    कैसे करें पाठ? (सरल विधि)

    • इसका पाठ सुबह सूर्योदय के समय या शाम को गोधूलि बेला में करना सबसे उत्तम होता है।
    • स्नान के बाद सफेद या लाल रंग के साफ कपड़े पहनकर ही पाठ करें।
    • अगर आप मंत्रों का जाप कर रहे हैं, तो स्फटिक या कमलगट्टे की माला का प्रयोग करें।
    •  पाठ के समय गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और हो सके तो सफेद मिठाई का भोग लगाएं।

    यहां पढ़ें श्री सूक्त का संपूर्ण पाठ

    श्री सूक्त पाठ (Shri Suktam Path)

    ओम हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
    चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
    ओम तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
    यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम॥

    ओम अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद्प्रमोदिनिम।
    श्रियं देविमुप हव्ये श्रीर्मा देवी जुषताम ॥
    ओम कां सोस्मितां हिरण्य्प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
    पद्मेस्थितां पदमवर्णां तामिहोप हवये श्रियम्॥

    Shri Suktam

    (Image Source: AI-Generated)

    ओम चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
    तां पद्मिनीमी शरणं प्रपधे अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
    ओम आदित्यवर्णे तप्सोअधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोsथ बिल्वः।
    तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याष्च बाह्य अलक्ष्मीः॥

    उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
    प्रदुर्भूतोsस्मि राष्ट्रेsस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में ॥
    क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठमलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
    अभूतिमसमृद्धि च सर्वां निर्णुद में गृहात्॥

    गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यापुष्टां करीषिणीम्।
    ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हवये श्रियम्।
    मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
    पशुनां रूपमन्नस्य मयि श्रियं श्रयतां यशः॥

    कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम।
    श्रियम वास्य मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
    आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् मे गृहे।
    नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥

    आद्रॉ पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पदमालिनीम्।
    चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह॥
    आद्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
    सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह॥

    तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मनपगामिनीम् ।
    यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योाश्रान विन्देयं पुरुषानहम्॥
    यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
    सूक्तं पञ्चदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत्॥

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