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    ओवरथिंकिंग और स्ट्रेस से हैं परेशान? मन को शांत करेंगे भगवद्गीता के ये 6 जादुई श्लोक

    Updated: Thu, 18 Jun 2026 09:00 AM (IST)

    आज के तनावपूर्ण दौर में भगवद्गीता के सूत्र मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के ये उपदेश जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सहा ...और पढ़ें

    अशांति से शांति की ओर। (Picture Credit- AI Generated)

    अशांति से शांति की ओर। (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. कर्म पर ध्यान दें, फल की चिंता न करें।

    2. सुख-दुख में मन को स्थिर और संतुलित रखें।

    3. आसक्ति त्यागें, स्वयं को ईश्वर को समर्पित करें।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आज का आधुनिक दौर तनाव, चिंता और मानसिक अशांति से भरा हुआ लगता है। लोग शांति पाने के लिए कई तरह के उपाय आजमाते है, लेकिन अक्सर जीवन के आध्यात्मिक पहलू पर ध्यान नहीं देते हैं।

    भगवद्गीता में खुद भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे सूत्र बताएं हैं, जिन्हें अगर व्यक्ति अपने जीवन में आत्मसात (अमल करना) करता है, तो वह अशांति से शांति की ओर बढ़ता चला जाएगा।

    आधुनिक दौर में गीता ज्ञान क्यों जरूरी? 

    आज के आधुनिक दौर में जहां चिंताएं हर किसी के मन पर हावी हैं, वहीं भगवद्गीता की शिक्षाएं व्यक्ति को मुश्किल समय में भी शांत रहना सिखाती है। यह मात्र एक ग्रंथ तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच एक दिव्य संवाद का साक्षी है, जो मनुष्य को शांति, स्पष्टता और संतुलन स्थापित करने का ज्ञान प्रदान करता है।

    जिन भी लोगों का मन आए दिन अशांत रहता है, मन में बार-बार नेगेटिव ख्याल, खुद को कमतर महसूस करना या बार-बार ओवरथिंकिंग की समस्या सताती है, उन्हें भगवद्गीता से जुड़े इन श्लोक को पढ़ना और समझना चाहिए। आइए जानते हैं उन श्लोकों के बारे में जो सच में किसी चमत्कार से कम नहीं है।

    भगवद्गीता से जुड़े श्लोक

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (भगवद्गीता के अध्याय 2 और श्लोक 47)

    मतलब- व्यक्ति को सिर्फ कर्म करना चाहिए, फल की चिंता किए बिना। क्योंकि जहां चिंता जन्म लेती है, वहां अपेक्षा होती है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, मनुष्यों को अपेक्षाओं से बचना चाहिए।

    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। (गीता अध्याय 6 और श्लोक 35)

    मतलब- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, मन के साक्षी बनो, गुलाम नहीं। मन में विचार आते हैं, जाते हैं लेकिन तुम स्थिर रहो।

    सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।(गीता अध्याय 2 और श्लोक 38)

    मतलब- व्यक्ति को सुख-दुख, हार-जीत, लाभ-हानि सभी तरह की परिस्थितियों में एक समान भाव रखना चाहिए। जो व्यक्ति हर स्थिति में समभाव यानी मन की स्थिति को स्थिर और संतुलन रखता है, उसे ही परम शांति की प्राप्ति होती है।

    खबरें और भी

    आगमापायिनोऽनित्या स्तांस्तितिक्षस्व भारत(गीता अध्याय 2 और श्लोक 14)

    मतलब- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को अर्जुन को समझाते हैं कि, जीवन में जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है। जो होगा, अच्छा ही होगा। मुझ पर भरोसा रखो, रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाएगा।

    सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधो भिजायते (गीता अध्याय 2 और श्लोक 62)

    मतलब- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, आसक्ति (किसी भी चीज के प्रति लगाव) ही बंधन है। इसलिए चीजों, लोगों से और परिणाम से पकड़ ढीली करो, जीवन में शांति मिलेगी।

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। (गीता अध्याय 18 और श्लोक 66)

    मतलब- इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण कहते हैं कि, खुद को अर्पण कर दो, जब मैं मिटता है, तो शांति का भाव प्रकट होता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।