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    600 गायें, सोना और रथ भी रह गए कम! जानिए क्यों एक फकीर ऋषि ने ठुकरा दिया राजा का दान

    Updated: Thu, 11 Jun 2026 05:00 PM (IST)

    छांदोग्य उपनिषद की यह कहानी राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कैसे एक मामूली रथ खींचने वाले व्यक्ति ने राजा का अहंकार तोड़ने के साथ ज्ञान प्रदान किया। ...और पढ़ें

    राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कहानी (AI-Generated Image)

    राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कहानी (AI-Generated Image)

    HighLights

    1. राजा जनश्रुति का अहंकार हंसों की बात से टूटा।

    2. रायक्वा ने राजा को विनम्रता और आत्मज्ञान का पाठ पढ़ाया।

    3. अहंकार त्यागने पर ही सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान मिलता है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। छांदोग्य उपनिषद हिंदू धर्म के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण उपनिषदों में से एक, जो सामवेद से जुड़ा है। इस उपनिषद से जुड़ी राजा जनश्रुति और रायक्वा (रथ के नीचे रहने वाला ऋषि) की कहानी जो सिखाती है कि, सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान सिर्फ विनम्रता और अहंकार को त्यागकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

    बहुत समय पहले जनश्रुति नाम का एक राजा था, जो काफी ज्ञानी, धर्मनिष्ठ और दानवीर था। वह खुद को सबसे बड़ा संरक्षक मानता था और उसके जैसा कोई दूसरा नहीं था। वह अपने द्वारा किए गए पुण्य का माप दान और धन के वितरण से करता था। एक राज वह अपने महल की सबसे ऊपरी मंजिल पर लेटा हुआ था, तभी राजा ने दो हंसों को आसमान में उड़ते हुए देखा, जो आपस में लगातार बातें कर रहे थे।

    राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कहानी

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    उनमें से एक हंस ने कहा, 'क्या तुम राजा जनश्रुति से निकलने वाली रोशनी की उज्जवल किरण नहीं देख रहे' सावधान रहो, कहीं तुम उनकी प्रसिद्धि के जलते प्रकाश में जल न जाओ। तुम्हें यह जानने की जरूरत है कि उनसे बड़ा आज दान-पुण्य के मामले में कोई नहीं है। दूसरे हंस ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया दी, अरे तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे यह जनश्रुति रथ खींचने वाले रायक्वा से भी महान हो। राजा तो सिर्फ नाम और यश के पीछे पागल है। वह हमेशा प्रशंसा का भूखा रहता है। पहला हंस हैरान रह गया और उसने पूछा यह रायक्वा कौन है? जो सिर्फ एक मामूली रथ खींचता है और फिर भी राजा जनश्रुति से महान है।

    हंसों ने तोड़ा राजा का घमंड

    राजा दोनों हंसों की बात सुन रहा था, तभी वे दोनों आंखों से ओझल हो गई। हंसों की बात सुनकर राजा काफी बेचैन हो गया था। रायक्वा का नाम उसे सताने लगा। राजा ने फौरन एक सेवक को उस महान आत्मा रायक्वा को खोजने के लिए भेजा। यह काम बिल्कुल आसान नहीं था, लेकिन बड़ी मुश्किल से सेवक ने रायक्वा को एक रथ के नीचे शरीर खुजलाते हुए पाया। सेवक ने उसे पूछा क्या तुम्ही रायक्वा हो?रायक्वा ने शांत और गरिमामयी उत्तर देते हुए कहा कि, हां मैं ही हूं। सेवक ने महल लौटकर रायक्वा के मिलने की सूचना राजा जनश्रुति को दी।

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    सेवक की बात सुनने के बाद राजा जनश्रुति पूरी तैयार की और 600 गायें, सोने की एक माला और खच्चर से चलने वाला रथ लेकर रायक्वा के पास पहुंचा। उन्होंने ये सब कुछ रायक्वा के पैरों में रख दिया है और कहा कि, हे प्रभु, कृपा करके इसे स्वीकार कीजिए। मुझे आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करें।

    राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कहानी (1)

    (AI-Generated Image)

    रायक्वा से मिले राजा जनश्रुति 

    रायक्वा ने राजा को फौरान कहा कि, दांव, रथ और गायें वापस ले लो, आत्मज्ञान बिकाऊ वस्तु नहीं है। जनश्रुति कुछ समय बाद एक बार फिर से हजार गायें, सोने की एक माला, खच्चर से चलने वाला रथ और अपनी पुत्री को रायक्वा को पत्नी के रूप में अर्पित करने के लिए कहा। उन्होंने यह सब अर्पित करते हुए प्रार्थना की कि, उन्हें जीवन के उच्च सत्यों का ज्ञान प्राप्त हो।

    रायक्वा इन भेंटों से जरा भी प्रभावित नहीं हुआ। लेकिन जनश्रुति की दृढ़ संकल्प और निष्ठा को देखकर हैरान रह गए। इन दोनों गुणों से युक्त व्यक्ति ही एक आदर्श शिष्य बनने के योग्य होता है।

    राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कहानी (2)

    (AI-Generated Image)

    रायक्वा ने कहा, इस दुनिया में अनेक तत्व हैं, जिनकी पूजा देवताओं के रूप में की जाती है। हवा जो सब कुछ बहा ले जाती है, आग के संपर्क में आने से हर चीज जल जाती है। प्राण किसी भी जीव को शक्ति प्रदान करता है। लेकिन ये सब अंदर विद्यमान आत्मा द्वारा संचालित होते हैं। यह आत्मा किसी के द्वारा सृजित नहीं है। यह खुद विद्यमान है।

    हे राजन, दान करते समय न तो घमंड करो और न ही अहंकार। अपने महल जाओ दान करो, लेकिन अहंकार की भावना से नहीं, बल्कि उदारता की भावना से करो। खुलकर दान करो लेकिन यश की लालसा से नहीं। दान करो लेकिन यह सोचकर नहीं, कि यह तुम्हारा अपना है, बल्कि इसलिए कि आत्मा ने तुम्हें यह वरदान दिया है ताकि तुम दूसरों की मदद कर सको। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वह ज्ञान बन जाता है और उसे किसी चीज की कमी नहीं रहती और वह वस्तुओं का अनांद लेने वाला बन जाता है।

    राजा जनश्रुति और ऋषि रायक्वा की कहानी (3)

    (AI-Generated Image)

    रायक्वा के ज्ञान के आगे राजा काफी प्रभावित हुए। प्रस्थान करते समय उन्होंने एक हजार दुधारू पशु, अनेक सोने के सिक्के, रथ और अपनी पुत्री का विवाह रायक्वा से कर दिया। इश बार रायक्वा ने इन भेंटों का अस्वीकार नहीं किया। इसके बाद इस गांव को राकवापर्णा के नाम से जाना जाने लगा, जिसका नाम रथ के दार्शनिक नाम पर रखा गया था।

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