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    सिद्धपीठ और शक्तिपीठ: एक जगह गिरे थे अंग, तो दूसरी जगह हुई तपस्या, पढ़ें ये आध्यात्मिक अंतर

    Updated: Sat, 04 Apr 2026 01:37 PM (IST)

    शक्तिपीठ (Shaktipeeth) त्याग और विग्रह का प्रतीक हैं, जबकि सिद्धपीठ (Siddhapeeth) साधना और सफलता का। हालांकि, भक्त के लिए दोनों ही स्थान बहुत पूजनीय ह ...और पढ़ें

    Shaktipeeth And Siddhapeeth: भूलकर भी एक न समझें शक्तिपीठ और सिद्धपीठ। (Ai Generated Image)

    Shaktipeeth And Siddhapeeth: भूलकर भी एक न समझें शक्तिपीठ और सिद्धपीठ। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. शक्तिपीठ जहां माता सती के शरीर के अंग गिरे थे

    2. सिद्धपीठ वह स्थान जहां कठोर साधना और तपस्या से सिद्धियां प्राप्त की गईं

    3. शक्तिपीठों की संख्या मुख्य रूप से 51 मानी जाती है

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में देवी उपासना का विशेष महत्व है। जब हम माता के मंदिरों के दर्शन के लिए जाते हैं, तो अक्सर दो शब्द सुनने को मिलते हैं, शक्तिपीठ और सिद्धपीठ। कई श्रद्धालु इन दोनों को एक ही मान लेते हैं, लेकिन आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से इनके बीच एक गहरा और स्पष्ट अंतर है। जहां शक्तिपीठों का संबंध माता सती के त्याग से है, वहीं सिद्धपीठों का आधार ऋषियों और देवताओं की कठिन तपस्या है। आइए इस आर्टिकल में सिद्धपीठ और शक्तिपीठ के बीच क्या अंतर है विस्तार से जानते हैं।

    Shaktipeeth and Siddhapeeth significance

    Ai Generated Image

    क्या होते हैं शक्तिपीठ?

    शिव पुराण के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। पूरे ब्रह्मांड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। पृथ्वी पर जहां-जहां माता सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ (Shaktipeeth) कहलाए। इन स्थानों पर देवी स्वयं साक्षात रूप में विराजमान मानी जाती हैं, क्योंकि यहां उनके शरीर के अंश गिरे थे। जैसे कि कामाख्या (योनि भाग) और कालीघाट (दाएं पैर की उंगलियां)।

    क्या होते हैं सिद्धपीठ?

    सिद्धपीठ (Siddhapeeth) उन स्थानों को कहा जाता है, जहां किसी ऋषि, मुनि, देवता या स्वयं माता ने सालों तक कठोर तपस्या की और सिद्धि प्राप्त की। यहां देवी का प्राकट्य किसी अंग के गिरने से नहीं, बल्कि पूजा-पाठ, साधना और संकल्प की वजह से हुआ है। सिद्धपीठ का मतलब है कि वह स्थान जहां साधक की मांगी गई सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इन स्थानों पर जाने से भक्तों को मानसिक शांति और आत्मिक शक्ति का अनुभव होता है।

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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