नवरात्र 15 जुलाई से; आचार्य पंकज बता रहे श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ का क्रम, देवी अथर्वशीर्षम के महत्व को भी आप समझ लें
Gupt Navratri 2026 : आचार्य पंकज अथर्व के अनुसार, 15 जुलाई से शुरू हो रहे गुप्त नवरात्र प्रकृति के 'ऋतु संधिकाल' से जुड़े हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता ...और पढ़ें
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15 जुलाई से शुरू होगा आषाढ़ गुप्त नवरात्र।
HighLights
गुप्त नवरात्र 15 जुलाई से 23 जुलाई 2026 तक।
'ऋतु संधिकाल' में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का पर्व।
श्रीदुर्गासप्तशती और देवी अथर्वशीर्षम पाठ महाफलदायी।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। Gupt Navratri 2026 : भारतीय सनातन संस्कृति में प्रकृति, आधुनिक विज्ञान और गुण रहस्यमयी आध्यात्मिकता का एक बेहद अनूठा और अटूट समन्वय देखने को मिलता है। एक यज्ञ की तैयारी में भागलपुर पहुंचे प्रसिद्ध तांत्रिक क्रिया योगी एवं ज्योतिषाचार्य स्मार्त परमहंस आचार्य पंकज अथर्व के मुताबिक, साल में आने वाले चार नवरात्र महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। ये चारों नवरात्र प्रकृति के उस अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड के सबसे बड़े साक्षी हैं, जिसे आधुनिक विज्ञान की सटीक भाषा में 'ऋतु संधिकाल' कहा जाता है।
ऋतु परिवर्तन के दौर में बैक्टीरिया और वायरस होते हैं सक्रिय
आगामी 15 जुलाई से आषाढ़ मास के पावन 'गुप्त नवरात्र' का भव्य शुभारंभ होने जा रहा है, जो आगामी 23 जुलाई 2026 तक श्रद्धापूर्वक चलेगा। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि यह विशेष समय दो प्रमुख ऋतुओं के मिलन का होता है, जहाँ एक ऋतु का समापन और दूसरी ऋतु का उद्भव हो रहा होता है। ऋतु परिवर्तन के इस नाजुक दौर में संपूर्ण वनस्पति और प्रकृति के भीतर सूक्ष्म स्तर पर बहुत भारी आंतरिक हलचल उत्पन्न होने लगती है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए मनीषियों ने बनाया व्रत का नियम
मौसम के इस संधिकाल के कारण हमारे आसपास के वातावरण में हानिकारक जीवाणु, विषाणु (Virus/Bacteria) और नकारात्मक शक्तियां अत्यधिक सक्रिय हो जाती हैं। इन सूक्ष्म वायरसों का सीधा और घातक प्रभाव मानव शरीर के इम्यून सिस्टम यानी उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल रूप से पड़ता है। हमारे त्रिकालदर्शी मनीषियों ने इस वैज्ञानिक सत्य को पहचानकर ही 'शक्ति की आराधना' का कड़ा विधान तय किया, ताकि व्रत-नियम से शरीर मजबूत हो सके।
दस महाविद्या और त्रिदेवी की प्रसन्नता के लिए अंतर्मुखी साधना
मंत्र साधना के माध्यम से मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को बढ़ाया जाता है और मानसिक चेतना को जागृत कर जीवन का कल्याण किया जाता है। सामान्य नवरात्र जहाँ बड़े सामाजिक उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं, वहीं आषाढ़ का गुप्त नवरात्र पूर्णतः अंतर्मुखी और मानसिक साधना का महापर्व माना जाता है। इस रहस्यमयी अवधि के दौरान साधक पूर्ण एकांत में रहकर मां भगवती के दिव्य स्वरूपों यानी अष्ट मातृका और दस महाविद्याओं की गुप्त आराधना करते हैं।
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समस्त संकटों का नाश करता है देवी अथर्वशीर्षम का यह पाठ
साधना में त्रिदेवी (महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती) की प्रसन्नता से भीतर के तमस और भय का नाश होता है तथा जीवन में भौतिक समृद्धि व ऐश्वर्य आता है। आचार्य पंकज अथर्व के अनुसार, गुप्त नवरात्र में दुर्गा 108 नाम, देवी अथर्वशीर्षम और दुर्गा 32 नाम का पाठ समस्त संकटों को जड़ से नष्ट कर देता है। इस पावन काल में मां भगवती की विशेष अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए 'श्री दुर्गासप्तशती' (दुर्गा सप्तशती) का क्रमबद्ध पाठ करना महाफलदाई माना गया है।
सप्तशती के 13 अध्यायों को 9 दिनों में ऐसे करें क्रमबद्ध
साधक अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार पूरे नवरात्र के दौरान सुविधा अनुसार कुल 3 पाठ या 9 पाठ का महासंकल्प लेकर अनुष्ठान कर सकते हैं। जो साधक प्रतिदिन संपूर्ण पाठ नहीं कर सकते, वे सप्तशती के 13 अध्यायों को 9 दिनों में क्रमबद्ध (प्रथम दिन पहला अध्याय, दूसरे दिन दूसरा व तीसरा) कर सकते हैं। इस पावन अवधि में पूर्ण सात्विक रहते हुए किया गया यह पाठ साधक के चारों ओर एक ऐसा अचूक दैवीय सुरक्षा कवच निर्मित करता है जिससे बाधाएं दूर होती हैं।
15 जुलाई को घटस्थापना के लिए मिलेंगे दो सबसे सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
आगामी 15 जुलाई 2026 को पवित्र घटस्थापना (कलश स्थापना) के साथ इस दिव्य और नौ दिवसीय महाअनुष्ठान की आधिकारिक शुरुआत जिले भर में हो जाएगी। कलश स्थापना के लिए प्रातः काल 05:33 बजे से 07:17 बजे तक का समय तथा दोपहर 11:59 बजे से 12:54 बजे तक का अभिजीत मुहूर्त सर्वोत्तम है। वहीं, 23 जुलाई को नवमी तिथि के पावन अवसर पर हवन सामग्री में शुद्ध घी, गूगल, काले तिल और औषधीय वनस्पतियों को मिलाकर महाहवन संपन्न कराया जाएगा।