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पूजा के बीच से उठना घर की शांति तो भंग नहीं कर रहा? शास्त्रों के अनुसार जानें इसके नुकसान

Published: Mon, 20 Apr 2026 07:39 PM (IST)

सनातन धर्म में हवन और पूजन के दौरान बीच में उठना वर्जित माना गया है। जानें मत्स्य पुराण और शास्त्रों ...और पढ़ें

हवन-पूजन के बीच उठना क्यों अशुभ? (Image Source: AI-Generated)

हवन-पूजन के बीच उठना क्यों अशुभ? (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में पूजा-पाठ और हवन का विशेष महत्व है। इसे केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने और ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा को अपने भीतर समाहित करने का एक विज्ञान माना गया है।

अक्सर बड़े-बुजुर्ग सलाह देते हैं कि हवन या पूजन के बीच में कभी नहीं उठना चाहिए। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों कहा जाता है? आइए जानते हैं इसके पीछे के आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण।

1. संकल्प की शक्ति और उसकी मर्यादा

जब भी हम कोई पूजा या हवन शुरू करते हैं, तो सबसे पहले 'संकल्प' लेते हैं। संकल्प का अर्थ है एक प्रतिज्ञा या वादा। हम ईश्वर के सामने यह प्रण लेते हैं कि हम इस विशिष्ट कार्य को पूरी निष्ठा के साथ संपन्न करेंगे। सनातन धर्म के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति संकल्प लेने के बाद बीच में ही उठ जाता है, तो वह अपने वचन से विचलित माना जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि अधूरा संकल्प न केवल पूजा के फल को नष्ट करता है, बल्कि व्यक्ति के अनुशासन और मानसिक बल को भी कमजोर करता है।

2. ऊर्जा का चक्र (Energy Circuit)

हवन के समय मंत्रों के उच्चारण और अग्नि की पवित्रता से एक विशेष 'ऊर्जा चक्र' निर्मित होता है। इसे एक विद्युत परिपथ (Electric Circuit) की तरह समझें। जब आप मंत्रों के बीच में बैठते हैं, तो वह ऊर्जा आपके शरीर और घर के वातावरण में प्रवाहित होती है। बीच में उठने से वह ऊर्जा का प्रवाह टूट जाता है।

मत्स्य पुराण के अनुसार, पूजन के दौरान एकाग्रता भंग होने से नकारात्मक शक्तियां प्रभावी हो सकती हैं, जो घर की सुख-शांति में बाधा डालती हैं।

3. देवताओं का अपमान

हिंदू परंपरा में हवन के दौरान आहुति देकर देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है। अगर आपके घर कोई सम्मानित अतिथि आए और आप उन्हें भोजन परोसकर बीच में ही छोड़कर चले जाएं, तो उन्हें कैसा लगेगा? ठीक इसी प्रकार, पूजन के बीच से उठना ईश्वरीय शक्तियों का निरादर माना जाता है, जिससे पुण्य मिलने के बजाय दोष लगता है।

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(Image Source: AI-Generated)

4. एकाग्रता और मानसिक शांति

पूजा का मुख्य उद्देश्य मन को शांत करना और उसे एक केंद्र पर लाना है। अगर हम छोटी-छोटी बातों या व्याकुलता के कारण उठते रहते हैं, तो हमारा मन कभी स्थिर नहीं हो पाता। अधूरा पूजन मन में एक अजीब सी भारीपन या अशांति छोड़ जाता है, जिसका सीधा असर हमारे स्वभाव और घर के माहौल पर पड़ता है।

शास्त्रों में क्या लिखा है?

  • मत्स्य पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जो साधक बिना पूर्णाहूति के आसन छोड़ देता है, उसकी साधना निष्फल हो जाती है।
  • श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान कृष्ण ने 'तप' और 'यज्ञ' में अनुशासन (अनुशासनम्) को अनिवार्य बताया है।
  • कर्मकांड भास्कर में भी लिखा है कि, पूजा के बीच उठने से 'अपूर्ण दोष' लगता है जिससे घर में क्लेश की स्थिति बन सकती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।