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धरती का नाम 'पृथ्वी' कैसे पड़ा? जानिए उस राजा की कहानी जिससे डरकर गाय बन गई थीं धरती मां!

Updated: Fri, 17 Jul 2026 10:27 AM (IST)

राजा पृथु ने बंजर धरती को फिर से हरा-भरा किया, जब धरती माता ने मानव की उपेक्षा के कारण अपने संसाधन छिपा लिए थे। यह कथा सिखाती है कि आज के समय में किसी सीख से कम नहीं।

मानव कल्याण के लिए जब राजा पृथु ने धरती मां से मांगी थी मदद (Picture Credits- AI Image)

मानव कल्याण के लिए जब राजा पृथु ने धरती मां से मांगी थी मदद (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। राजा पृथु और धरती माता से जुड़ी एक ऐसी कथा जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण स्कंध 4, अध्याय 14 से 18 तक में देखने को मिलता है। जब धरती पूरी तरह बंजर हो चुकी थी और मानव जीवन निराशा के कगार पर पहुंच चुका था। तब राजा पृथु ने एक दिव्य उद्धारकर्ता (मुक्तिदाता) के रूप में सामने आए।

अपने अडिग संकल्प और इच्छा शक्ति के साथ उन्होंने धरती माता का सामना किया। मनुष्य की उपेक्षा के कारण मां ने अपना प्रभुत्व रोक दिया था। यह कहानी उस राजा पृथु की है, जिसने धरती का सम्मान करना सिखाया।

राजा पृथु की उत्पत्ति 

काफी समय पहले वेना नाम का एक राजा था, जो अपनी प्रजा की रक्षा करने के बजाय उनके खिलाफ और अन्यायपूर्ण रवैया रखता था। ऋषियों ने उसे बार-बार धर्म के मार्ग को अपनाने की बात कही, लेकिन उसने इस बात को सुनने से भी मना कर दिया। आखिरकर राजा के घमंडी स्वभाव के कारण ऋषियों ने उसे सत्ता से हटा दिया। जल्द ही पूरे राज्य में अफरा-तफरी मच गई, लोगों को काफी तकलीफ हुई।

राज्य में चोर और गलत आचरण वाले लोग प्रजा को परेशान करने लगी। राज्य की बदहाली व्यवस्था को ठीक करने के लिए वेना के शरीर से पृथुन नाम के महान राजा को जन्म दिया। पृथु एक दिव्य और शक्तिशाली शासक माना जाता था, जो दुनिया की रक्षा करने के लिए पैदा हुआ था।

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धरती मां ने लिया गाय का रूप

जब राजा पृथु ने राज करने शुरू किया तो उन्होंने देखा कि राज्य में लोग भूखे मर रहे थे। फसलें उग नहीं रही थीं और जमीन पूरी तरह बंजर हो गई थी। लोग राजा के पास मदद की गुहार लेकर पहुंचे। पृथु को एहसास हुआ कि, धरती मां ने सारे बीज, अनाज और औषधीय युक्त पौधे अपने अंदर छिपा रखें हैं।

इसके बाद राजा पृथु ने अपना धनुष उठाया और पृथ्वी को ढूंढने के लिए निकल पड़े। उनका गुस्सा देखकर धरती माता ने एक गाय का रूप ले लिया, ब्रह्मांड में भाग गई। लेकिन वह जहां भी जाती, पृथु उनके पीछे-पीछे आ जाते। आखिर में उन्हें यह एहसास हुआ कि, वह भाग नहीं सकती, वह रुक गई और राजा से बात की।

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राजा पृथु का नाम पृथ्वी कैसे पड़ा?

राजा पृथु से मिलकर धरती माता ने बताया आखिर किस कारण से उन्होंने अपनी दौलत छुपाई। राजा वेना के शासन में काफी गैर जिम्मेदार हो गए थे। बिना किसी शुक्रगुजारी के या रोक-टोक के पृथ्वी के अमूल्य संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे थे। अगर मैं धरती पर रहने वाले लोगों को इसी तरह पौषण देती, तो रिसोर्स खत्म हो जाएंगे। इसलिए मैंने पृ्थ्वी की शक्ति खत्म कर दी।

राजा पृथु धरती माता की बातों को ध्यान से सुन रहे थे। उन्होंने धर्म की स्थापना करने और यह सुनिश्चित करने का वादा किया कि लोग अब से प्रकृति का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ करेंगे। तब जाकर फिर से धरती मां एक बार फिर से धरती के उद्धार के लिए मानी। उन्होंने राजा पृथु को गाय की तरह दूध निकालने की सलाह दी। राजा पृथु ने इंसानों के लिए खाना और पेड़-पौधे जुटाए।

इसके बाद पृथु ने भूमि को समतल किया, बस्तियां बसाई, शहर और गांव बसे और खेती की गई। इसके बाद राज्यभर में एक बार फिर से भूमि हरी भरी होने के साथ खुशहाली लौट आई।

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राजा पृथु के अपने धर्म युक्त कर्तव्य से धरती माता इतनी आभारी हुई कि, उन्होंने पृथु को अपना रक्षक मान लिया। पौराणिक परंपराओं के मुताबिक, राजा पृथु के सम्मन में ही धरती का नाम पृथ्वी रखा जाने लगा। इस कथा से आज के मनुष्यों के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि, धरती मां सब कुछ देती है, लेकिन इसके बदले में मनुष्यों को शुक्रगुजारी और सम्मान करना चाहिए।

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