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पितृ दोष से हैं परेशान? पूर्वजों के सम्मान और पिता की सेवा में छिपा है इसका समाधान

Published: Thu, 18 Jun 2026 03:00 PM (IST)

हिंदू धर्म में माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च माना गया है, जो पितृ दोष से मुक्ति दिला सकती है। शास्त्रों ...और पढ़ें

पिता की सेवा से पितृ दोष ठीक होता है। (Picture Credit- AI Generated)

पिता की सेवा से पितृ दोष ठीक होता है। (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. माता-पिता की सेवा हिंदू धर्म में सर्वोपरि मानी गई है।

  2. पितृ दोष पूर्वजों के असंतुष्ट कर्मों का ऋण होता है।

  3. बड़ों का सम्मान कर पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में माता-पिता की सेवा को सर्वोपरि धर्म और ईश्वरीय पूजा के रूप में देखा जाता है। हिंदू शास्त्रों और पुराणों में इस बात पर जोर दिया जाता है कि, माता-पिता की सेवा करने वाला मनुष्य कभी भी दुख का भागी नहीं बनता।

वही जो व्यक्ति अपने माता-पिता का सम्मान न करता हो, उनके साथ गलत आचरण या व्यवहार के साथ पेश आता है, उसे मरने के बाद नर्क की प्राप्ति तो होती ही है, लेकिन जीते जी वह पितृ दोष का भी शिकार होता है।

पितृ दोष क्या होता है?

पितृ दोष को सामान्य भाषा में समझे तो संतानों द्वारा पुरखों के साथ किया गया कोई भी गलत काम पितृ दोष का कारण बनता है। वैदिक ज्योतिष में राहु को पितृ दोष का मुख्य कारण माना जाता है।

जिस व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है, उसका मतलब उसके पूर्वज उससे खुश नहीं है। पितृ दोष के कारण व्यक्ति को अपने जीवन में बीमारियां, नाकामी, पढ़ाई में रुकावट, कर्ज और संतानहीन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।ॉ

पिता की सेवा से पितृ दोष की समस्या खत्म

पिता की सेवा से पितृ दोष ठीक होता है। (Picture Credit- AI Generated)

पिता की सेवा से पितृ दोष कैसे दूर होगा

जिन भी लोगों की कुंडली में पितृ दोष है, उन्होंने सबसे पहले घर के बड़े बुजुर्गों के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृ दोष कोई श्राप नहीं है, बल्कि पूर्वजों के असंतुष्ट कर्मों या आपके बुरे कर्मों का दोष है।

दरअसल सनातन धर्म में पिता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे वंश परंपरा और गृहस्थ जीवन में धर्म के पहले धारक (किसी वस्तु, संपत्ति या अधिकार को अपने पास रखने वाला) माने जाते हैं। ऋग्वेद में पिता के संदर्भ में कहा गया है कि, पितॄन् यज्ञेन यजामहे।'

अर्थात्- हम यज्ञ के जरिए पितरों (पूर्वजों की उपासना करते हैं)

इसके अलावा भगवान शिव से जुड़े स्कंद पुराण में पिता को लेकर कहा गया है कि, 'पितुः सेवा महापुण्यम्।'

अर्थात्- पिता की सेवा ही महान पुण्य फल प्रदान करती है।

पद्मपुराण में पिता के लिए एक श्लोक है-

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।

पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः॥

अर्थात्- पिता ही धर्म हैं, पिता ही स्वर्ग हैं और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तप हैं। जब पिता खुश होते हैं, तो सभी देवता खुश हो जाते हैं।

यह सभी बातें इस बात को उजागर करती है, जिस भी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है, उसे सबसे पहले अपने बड़े बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना रखनी चाहिए। पूर्वजों के प्रति आदर और प्यार की भावना बनाए रखने से पितृ दोष की समस्या खत्म होती है।

पितृ सेवा का अर्थ है अपने मृत पूर्वजों (पितरों) को श्रद्धा, स्मरण और वैदिक कर्मों के द्वारा शांति और तृप्ति प्रदान करना। शास्त्र कहते हैं कि पितृ दोष कोई 'शाप' नहीं, बल्कि पूर्वजों के असंतुष्ट कर्मों या आपके कर्मों का ऋण है। पितृ सेवा से यह ऋण उतरता है, उनकी आत्मा को सद्गति मिलती है, जिससे पितृ दोष दूर हो जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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