जुड़ शीतल : संक्रांति से शुरू होंगे वैशाख स्नान, कल्पवास और धार्मिक परंपराएं, क्यों खास है सतुवाइन पर्व
मिथिला क्षेत्र में 15 अप्रैल को जुड़ शीतल पर्व मनाया जाएगा, जबकि 14 अप्रैल को संक्रांति है। इस दिन से वैशाख स्नान और हरिद्वार में कल्पवास शुरू होगा। स ...और पढ़ें

मिथिला में जुड़ शीतल की तैयारी, 14 अप्रैल को संक्रांति और सतुवाइन पर्व
HighLights
जुड़ शीतल पर्व 15 अप्रैल को, संक्रांति 14 अप्रैल को।
सतुवाइन पर गुड़, सत्तू, जलपात्र दान का विशेष महत्व।
प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों पर जल सिंचन की परंपरा।
संवाद सूत्र, करजाईन बाजार (सुपौल)। देश के कुछ राज्यों में रबी फसल की कटाई की खुशी में किसान बैसाखी का पर्व मनाते हैं, जबकि मिथिला क्षेत्र में यही पर्व जुड़ शीतल के रूप में मनाने की परंपरा है। इस वर्ष जुड़ शीतल पर्व 15 अप्रैल को मनाया जाएगा।
संक्रांति से शुरू होंगे धार्मिक अनुष्ठान
ज्योतिषीय गणना के अनुसार 14 अप्रैल को संक्रांति है, जिसका पुण्यकाल दिन में 11 बजकर 56 मिनट से सूर्यास्त तक रहेगा। इसी दिन से वैशाख स्नान की शुरुआत भी होगी और हरिद्वार में कल्पवास का शुभारंभ माना जाएगा। संक्रांति के दिन सतुवाइन पर्व भी मनाया जाएगा, जिसमें दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है।
दान-पुण्य की परंपरा
इस दिन गुड़, सत्तू, ऋतु फल और जल से भरे घड़े का दान करने की परंपरा है। कई स्थानों पर जल से भरा कलश दान करने की भी प्रथा निभाई जाती है।आचार्य पंडित धर्मेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार इस दिन किए गए दान का विशेष धार्मिक महत्व होता है और इसे पुण्यदायी माना गया है।
पुराणों में वर्णित महत्व
आचार्य ने बताया कि पद्म पुराण में उल्लेख है कि मेष संक्रांति के पुण्यकाल में जो व्यक्ति जल, घड़ा और सत्तू का दान करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर अपने पितरों को प्रसन्न करता है। ऐसे दान से व्यक्ति को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
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विविध वस्तुओं के दान का फल
पुराणों के अनुसार चावल, गेहूं, जौ, तिल, फल और सत्तू जैसी भोज्य सामग्री को दक्षिणा सहित ब्राह्मण या संतों को दान करने से परम गति की प्राप्ति होती है। इसके अलावा जूता-चप्पल, छाता, वस्त्र और जलपात्र का दान करने से तीनों प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।
जुड़ शीतल की परंपरा
स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है कि जुड़ शीतल के दिन लोग बासी भात और दही को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं। यह परंपरा स्वास्थ्य और प्रकृति संतुलन से भी जुड़ी मानी जाती है।
प्रकृति संरक्षण और जल सिंचन की परंपरा
इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में वृक्षों, फूल-फलों और मार्गों पर जल का सिंचन कर प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया जाता है। बुजुर्ग लोग तांबे के जलपात्र में जल भरकर छोटे लोगों के सिर पर सिंचन करते हैं, जिसे आयु वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
शिवालयों में विशेष जलाभिषेक
इस अवसर पर घड़े में छोटा छिद्र कर तुलसी के पौधे और शिवालयों में शिवलिंग पर बूंद-बूंद जल अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है।यह धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और आस्था के साथ जुड़ा हुआ है और समाज में सांस्कृतिक एकता का संदेश देता है।