साधारण नहीं है केदारनाथ के पुजारी का चयन: पढ़ें लिंगायत परंपरा और 'रावल' पद से जुड़े कड़े नियम
केदारनाथ धाम के पुजारी 'रावल' का चयन कैसे होता है? आइए इस आर्टिकल में जानते हैं।

केदारनाथ धाम: कौन होते हैं 'रावल' और क्यों सिर्फ लिंगायत समुदाय से ही चुने जाते हैं। Ai Generated Image

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिमालय की गोद में स्थित बाबा केदारनाथ का धाम न केवल अपनी दिव्यता के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी सदियों पुरानी परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। केदारनाथ मंदिर की पूजा व्यवस्था उत्तर और दक्षिण भारत के अद्भुत मिलन का प्रतीक है। यहां के मुख्य पुजारी, जिन्हें 'रावल' कहा जाता है, उनका चयन कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। यह परंपरा सीधे तौर पर दक्षिण भारत के वीरशैव लिंगायत समुदाय से जुड़ी है। ऐसे में चलिए एस्ट्रोलॉजर आनंद सागर पाठक से इससे जुड़ी प्रमुख बातें जानते हैं।

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आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा
केदारनाथ धाम में पूजा की वर्तमान व्यवस्था की नींव 8वीं शताब्दी में जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने रखी थी। उन्होंने ही यह निर्धारित किया था कि केदारनाथ के मुख्य पुजारी हमेशा दक्षिण भारत के कर्नाटक, केरल या तमिलनाडु के 'वीरशैव लिंगायत' समुदाय से ही होंगे। यह व्यवस्था भारत की सांस्कृतिक एकता को दिखाती है, जहां उत्तर के धाम में दक्षिण के विद्वान सेवा करते हैं।
पुजारी के चयन के कड़े नियम
रावल का पद अत्यंत गरिमामय और कठिन होता है। इनके चयन के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें हैं -
- समुदाय और वंश - उम्मीदवार का लिंगायत समुदाय के जंगम संप्रदाय से होना जरूरी है।
- ब्रह्मचर्य का पालन - मुख्य पुजारी के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी है। रावल विवाहित नहीं हो सकते।
- शास्त्रों का ज्ञान - उम्मीदवार को वेदों, उपनिषदों और शैव आगमों का ज्ञान होना चाहिए।
- कठिन जीवनशैली - केदारनाथ के रावल स्वयं मंदिर के गर्भगृह में पूजा नहीं करते, बल्कि उनके निर्देशानुसार उनके द्वारा नियुक्त किए गए पुजारी यानी नायब रावल पूजा करते हैं। रावल की जीवनशैली पूरी तरह से सात्विक होती है।
रावल और नायब रावल का अंतर
मुख्य पुजारी यानी 'रावल' को केदारनाथ मंदिर का आध्यात्मिक प्रमुख माना जाता है। शीतकाल में जब भगवान केदारनाथ की डोली उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर आती है, तब रावल वहीं रहकर पूजा का संचालन करते हैं। मंदिर के कपाट खुलने पर भी रावल की अनुमति और उपस्थिति जरूरी होती है। उनकी सहायता के लिए अन्य पुजारी होते हैं जिन्हें 'नायब रावल' कहा जाता है, जो गर्भगृह की दैनिक पूजा को पूर्ण करते हैं।
सदियों पुराना चलन
रावल की नियुक्ति एक बहुत ही औपचारिक और पवित्र प्रक्रिया के माध्यम से की जाती है, जिसमें धार्मिक अधिकारी और मंदिर समिति शामिल होते हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि पुजारी पूरी तरह से आध्यात्मिक अनुशासन और वैदिक परंपराओं का पालन करें। यह परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह सदियों पुराना चलन उत्तराखंड और कर्नाटक के बीच एक अनोखा सांस्कृतिक मेल दिखाता है। इस व्यवस्था के कारण ही केदारनाथ मंदिर के अनुष्ठान और इसकी पवित्र विरासत आज भी सुरक्षित है।
श्रद्धा और अनुशासन की सीख
ज्योतिषाचार्य आनंद सागर पाठक का कहना है कि भगवान केदारनाथ की सेवा की यह पद्धति हमें सिखाती है कि जीवन के सही संचालन के लिए अनुशासन और परंपराओं का सम्मान करना कितना आवश्यक है। यह व्यवस्था हमें बताती है कि जब हम नियमों और मर्यादाओं में रहकर कोई कार्य करते हैं, तो उसकी पवित्रता बनी रहती है। केदारनाथ धाम की यह दिव्य परंपरा हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनने की प्रेरणा प्रदान करती है।
अस्वीकरण: इस लेख में बताएं गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
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